अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 24 अक्तूबर 2022

बिलावलु महला ४ ॥ हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥ मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ मै हिरड पलास संगि हरि बुहीआ ॥१॥ जपि जगंनाथ जगदीस गुसईआ ॥ सरणि परे सेई जन उबरे जिउ प्रहिलाद उधारि समईआ ॥१॥ रहाउ ॥ भार अठारह महि चंदनु ऊतम चंदन निकटि सभ चंदनु हुईआ ॥ साकत कूड़े ऊभ सुक हूए मनि अभिमानु विछुड़ि दूरि गईआ ॥२॥ रतन पदारथ गुरमति पावै सागर भगति भंडार खुल्हईआ ॥ गुर चरणी इक सरधा उपजी मै हरि गुण कहते त्रिपति न भईआ ॥४॥ परम बैरागु नित नित हरि धिआए मै हरि गुण कहते भावनी कहीआ ॥ बार बार खिनु खिनु पलु कहीऐ हरि पारु न पावै परै परईआ ॥५॥ सासत बेद पुराण पुकारहि धरमु करहु खटु करम द्रिड़ईआ ॥ मनमुख पाखंडि भरमि विगूते लोभ लहरि नाव भारि बुडईआ ॥६॥ नामु जपहु नामे गति पावहु सिम्रिति सासत्र नामु द्रिड़ईआ ॥ हउमै जाइ त निरमलु होवै गुरमुखि परचै परम पदु पईआ ॥७॥ इहु जगु वरनु रूपु सभु तेरा जितु लावहि से करम कमईआ ॥ नानक जंत वजाए वाजहि जितु भावै तितु राहि चलईआ ॥८॥२॥५॥

अर्थ: हे भाई! जगत के नाथ, जगत के ईश्वर, धरती के पति प्रभू का नाम जपा कर। जो मनुष्य प्रभू की शरण आ पड़ते हैं, वह मनुष्य (संसार-समुंद्र में से) बच निकलते हैं, जैसे प्रहलाद (आदि भक्तों) को (परमात्मा ने संसार-समुंद्र से) पार लंघा के (अपने चरणों में) लीन कर लिया।1। रहाउ। हे प्रभू! प्रभू का नाम सिमरा करो, ये नाम ठंडक पहुँचाने वाला जल है, ये नाम चंदन की सुगंधि है जो (सारी बनस्पति को) सुगन्धित कर देती है। हे भाई! साध-संगति में मिल के सभ से ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल किया जा सकता है। जैसे अरण्डी और पलाह (आदि निकम्मे पौधे चंदन की संगति में) सुगंधित हो जाते हैं, (वैसे ही) मेरे जैसे जीव (हरी नाम की बरकति से ऊँचे जीवन वाले बन जाते हैं)।1। हे भाई! सारी बनस्पतियों में चंदन सबसे श्रेष्ठ (वृक्ष) है, चंदन के नजदीक (उगा हुआ) हरेक पौधा चंदन बन जाता है। पर परमात्मा से टूटे हुए माया-ग्रसित प्राणी (उन पौधों जैसे हैं जो धरती से खुराक मिलने पर भी) खड़े हुए ही सूख जाते हैं, (उनके) मन में अहंकार बसता है, (इस वास्ते परमात्मा से) विछुड़ केवे कहीं दूर पड़े रहते हैं।2। हरि गति मिति करता आपे जाणै सभ बिधि हरि हरि आपि बनईआ ॥ जिसु सतिगुरु भेटे सु कंचनु होवै जो धुरि लिखिआ सु मिटै न मिटईआ ॥३॥ हे भाई! परमात्मा कैसा है और कितना बड़ा है- यह बात वह स्वयं ही जानता है। (जगत की) सारी मर्यादाएं उसने खुद ही बनाई हुई हैं। (उस मर्यादा के अनुसार) जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है, वह सोना बन जाता है (स्वच्छ जीवन वाला बन जाता है)। हे भाई! धुर दरगाह से (जीवों के किए कर्मों के अनुसार जीवों के माथे ऊपर जो लेख) लिखे जाते हैं, वह लेख (किसी के अपने उद्यम से) मिटाए मिट नहीं सकता (गुरू को मिल के ही लोहे से कंचन बनता) है।3। हे भाई! (गुरू के अंदर) भगती के समुंद्र (भरे पड़े) हैं, भगती के खजाने खुले पड़े हैं, गुरू की मति पर चल के ही मनुष्य (ऊँचे आत्मिक गुण) रत्न प्राप्त कर सकता है। (देखो) गुरू के चरणों में लग के (ही मेरे अंदर) एक परमात्मा के लिए प्यार पैदा हुआ है (अब) परमात्मा के गुण गाते हुए मेरा मन भरता नहीं है।4। हे भाई! जो मनुष्य सदा ही परमात्मा का ध्यान धरता रहता है उसके अंदर सबसे ऊँची लगन बन जाती है। प्रभू के गुण गाते-गाते जो प्यार मेरे अंदर बना है, (मैंने तुम्हें उसका हाल) बताया है। सो, हे भाई! बार बार, हरेक पल, हरेक छिन, परमात्मा का नाम जपना चाहिए (पर, यह याद रखो कि) परमात्मा परे से परे है, कोई जीव उस (की हस्ती) का परला छोर ढूँढ नहीं सकता।5। हे भाई! वेद-पुरान-शास्त्र (आदि धर्म पुस्तकें इसी बात पर) जोर देते हैं (कि खट-कर्मी) धर्म कमाया करो, इन छह धार्मिक कर्मों के बारे में ही दृढ़ करते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (इसी) पाखण्ड में भटकना में (पड़ कर) दुखी होते रहते हैं, (उनकी जिंदगी की) बेड़ी (अपने ही पाखण्ड के) भार से लोभ की लहर में डूब जाती है।6। हे भाई! परमात्मा का नाम जपा करो, नाम में जुड़ के ही उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त करोगे। (अपने हृदय में परमात्मा का) नाम दृढ़ करके टिकाए रखो, (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के लिए ये हरी-नाम ही) स्मृतियों-शास्त्रों का उपदेश है। (हरी-नाम के द्वारा ही जब मनुष्य के अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है, तब मनुष्य पवित्र जीवन वाला बन जाता है। गुरू की शरण पड़ कर मनुष्य (परमात्मा के नाम में) पतीजता है, तब सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है।7। हे नानक! (कह- हे प्रभू!) यह सारा जगत तेरा ही रूप है तेरा ही रंग है। जिस तरफ तू (जीवों को) लगाता है, जीव वही कर्म करते है। जीव (तेरे बाजे हैं) जैसे तू बजाता है, वैसे ही बजते हैं। जिस राह पर चलाना तुझे अच्छा लगता है, उसी राह पर जीव चलते हैं।8।2।


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