अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 7 फरवरी 2024

सोरठि महला ३ ॥ सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥ आपणै भाणै जो चलै भाई विछुड़ि चोटा खावै ॥ बिनु सतिगुर सुखु कदे न पावै भाई फिरि फिरि पछोतावै ॥१॥ हरि के दास सुहेले भाई ॥ जनम जनम के किलबिख दुख काटे आपे मेलि मिलाई ॥ रहाउ ॥ इहु कुट्मबु सभु जीअ के बंधन भाई भरमि भुला सैंसारा ॥ बिनु गुर बंधन टूटहि नाही गुरमुखि मोख दुआरा ॥ करम करहि गुर सबदु न पछाणहि मरि जनमहि वारो वारा ॥२॥ हउ मेरा जगु पलचि रहिआ भाई कोइ न किस ही केरा ॥ गुरमुखि महलु पाइनि गुण गावनि निज घरि होइ बसेरा ॥ ऐथै बूझै सु आपु पछाणै हरि प्रभु है तिसु केरा ॥३॥ सतिगुरू सदा दइआलु है भाई विणु भागा किआ पाईऐ ॥ एक नदरि करि वेखै सभ ऊपरि जेहा भाउ तेहा फलु पाईऐ ॥ नानक नामु वसै मन अंतरि विचहु आपु गवाईऐ ॥४॥६॥

हे भाई वो ही मनुख गुरु का सिख है , गुरु का मित्र है, गुरु का रिश्तेदार है, जो गुरु की रज़ा में चलता है। परन्तु जो मनुख अपनी इच्छा अनुसार चलता है, वह प्रभु से बिछुड़ कर दुःख सहारता है। गुरु की शरण आये बिने मनुख कभी सुख नहीं पा सकता, और बार बार (दुखी हो कर) पछताता है॥1॥ हे भाई! परमात्मा के भक्त सुखी जीवन व्यतीत करते है। परमात्मा खुद उनके जन्मों जन्मों के दुःख पाप काट देता है, और, उनको अपने चरणों में मिला लेता है॥रहाउ॥ हे भाई! (गुरु की रज़ा में चले बिना) यह अपना ) परिवार भी जीवन के लिए केवल मोह का बंधन बन जाता है, (तभी) जगत (गुरु से) भटक कर कुराहे पड़ा रहता है। गुरु की शरण आने के बिना यह बंधन टुटते नहीं। गुरु की शरण आने वाला मनुख (मोह के बंधन से) खलासी पाने का रास्ता खोज लेता है। जो मनुख केवल दुनिया के काम-धंधे ही करते हैं, परन्तु गुरु के साथ साँझ नहीं बना पाते, वह बार बार जन्म मरन में आते रहते है॥2॥ हे भाई! ‘मैं बड़ा हूँ’, ‘ये धन आदि मेरा है’ – इसमें ही जगत उलझा हुआ है (वैसे) कोई भी किसी का (सदा साथी) नहीं बन सकता। गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह करते हैं, और परमात्मा की हजूरी प्राप्त किए रहते हैं, उनका (आत्मिक) निवास प्रभू चरणों में हुआ रहता है। जो मनुष्य इस जीवन में ही (इस भेत को) समझ लेता है, वह अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है (आत्म चिंतन करता है), परमात्मा उस मनुष्य का सहायक बना रहता है।3। हे भाई! गुरू हर समय ही दयावान रहता है (माया-ग्रसित मनुष्य गुरू की शरण नहीं आता) किस्मत के बिना (गुरू से) क्या मिले? गुरू सबको एक प्यार की निगाह से देखता है। (पर हमारी जीवों की) जैसी भावना होती है वैसा ही फल (हमें गुरू से) मिल जाता है। हे नानक! (अगर गुरू की शरण पड़ के अपने) अंदर से स्वै भाव दूर कर लें तो परमात्मा का नाम मन में आ बसता है।4।6।


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