अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 5 फरवरी 2024

बिलावलु महला ५ ॥ अपणे बालक आपि रखिअनु पारब्रहम गुरदेव ॥ सुख सांति सहज आनद भए पूरन भई सेव ॥१॥ रहाउ ॥ भगत जना की बेनती सुणी प्रभि आपि ॥ रोग मिटाइ जीवालिअनु जा का वड परतापु ॥१॥ दोख हमारे बखसिअनु अपणी कल धारी ॥ मन बांछत फल दितिअनु नानक बलिहारी ॥२॥१६॥८०॥

अर्थ :- हे भाई ! परमात्मा सब से बड़ा देवता (है, हम जीव उस के बच्चे हैं) अपने बच्चों की वह सदा ही आप रक्षा करता आया है । (जो मनुख उस की शरण पड़ते हैं, उन के अंदर) शांती, आत्मिक अढ़ोलता के सुख आनंद पैदा होते हैं, उन की सेवा-सुमिरन की घाल सफल हो जाती है ।1 ।रहाउ । हे भाई ! जिस भगवान का (सब से) बड़ा तेज-प्रताप है उस ने अपने भक्तों की अरजोई (सदा) सुनी है (उन के अंदर से) रोग मिटा के उनको आत्मिक जीवन की दाति बख्शी है ।1 । हे भाई ! उस भगवान-पिता ने हम बच्चों के ऐब सदा बख्शे हैं, और हमारे अंदर अपने नाम की ताकत भरी है । हे नानक ! भगवान-पिता ने हम बच्चों को सदा मन-माँगे फल दिये हैं, उस भगवान से सदा सदके जाना चाहिए ।2 ।16 ।80 ।


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