संधिआ ​​वेले का हुक्मनामा – 06 जुलाई 2026

अंग : 728
सूही महला १ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ अंतरि वसै न बाहरि जाइ ॥ अम्रितु छोडि काहे बिखु खाइ ॥१॥ ऐसा गिआनु जपहु मन मेरे ॥ होवहु चाकर साचे केरे ॥१॥ रहाउ ॥ गिआनु धिआनु सभु कोई रवै ॥ बांधनि बांधिआ सभु जगु भवै ॥२॥ सेवा करे सु चाकरु होइ ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ सोइ ॥३॥ हम नही चंगे बुरा नही कोइ ॥ प्रणवति नानकु तारे सोइ ॥४॥१॥२॥
अर्थ: (सेवक वह है जिसका मन) दुनिया के रस पदार्थों की तरफ नहीं दौड़ता, और अपने अंतरात्मे ही (प्रभू चरणों में) टिका रहता है; परमात्मा का नाम-अमृत छोड़ के वह विषियों का जहर नहीं खाता।1। हे मन! परमात्मा के साथ ऐसी गहरी सांझ पक्की कर, (जिसकी बरकति से) तू उस सदा कायम रहने वाले प्रभू का (सच्चा) सेवक बन सके।1। रहाउ। ज़्बानी-ज़बानी तो हर कोई कहता है कि मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है, मेरी सुरति जुड़ी हुई है, पर (देखने में ये आता है कि) सारा जगत माया के मोह के बँधनों में बँधा हुआ भटक रहा है (सिर्फ ज़ुबान से कहने भर से कोई प्रभू का सेवक नहीं बन सकता)।2। जो मनुष्य (मन को बाहर भटकने से हटा के प्रभू का) सिमरन करता है वही (प्रभू का) सेवक बनता है, उस सेवक को प्रभू जल में, धरती के अंदर, आकाश में हर जगह व्याप्त दिखता है।3। नानक विनती करता है– जो मनुष्य (अहंकार का त्याग करता है और) समझता है कि मैं औरों से बढ़िया नहीं, ऐसे सेवक को परमात्मा (संसार-समुंद्र की विकार-लहरों से) पार लंघा लेता है।4।1।2।


Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Begin typing your search term above and press enter to search. Press ESC to cancel.

Back To Top