अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 7 मई 2024

रामकली महला १ ॥ साहा गणहि न करहि बीचारु ॥ साहे ऊपरि एकंकारु ॥ जिसु गुरु मिलै सोई बिधि जाणै ॥ गुरमति होइ त हुकमु पछाणै ॥१॥ झूठु न बोलि पाडे सचु कहीऐ ॥ हउमै जाइ सबदि घरु लहीऐ ॥१॥ रहाउ॥ गणि गणि जोतकु कांडी कीनी ॥ पड़ै सुणावै ततु न चीनी ॥ सभसै ऊपरि गुर सबदु बीचारु ॥ होर कथनी बदउ न सगली छारु ॥२॥ नावहि धोवहि पूजहि सैला ॥ बिनु हरि राते मैलो मैला ॥ गरबु निवारि मिलै प्रभु सारथि ॥ मुकति प्रान जपि हरि किरतारथि ॥३॥ वाचै वादु न बेदु बीचारै ॥ आपि डुबै किउ पितरा तारै ॥ घटि घटि ब्रहमु चीनै जनु कोइ ॥ सतिगुरु मिलै त सोझी होइ ॥४॥ गणत गणीऐ सहसा दुखु जीऐ ॥ गुर की सरणि पवै सुखु थीऐ ॥ करि अपराध सरणि हम आइआ ॥ गुर हरि भेटे पुरबि कमाइआ ॥५॥ गुर सरणि न आईऐ ब्रहमु न पाईऐ ॥ भरमि भुलाईऐ जनमि मरि आईऐ ॥ जम दरि बाधउ मरै बिकारु ॥ ना रिदै नामु न सबदु अचारु ॥६॥ इकि पाधे पंडित मिसर कहावहि ॥ दुबिधा राते महलु न पावहि ॥ जिसु गुर परसादी नामु अधारु ॥ कोटि मधे को जनु आपारु ॥७॥ एकु बुरा भला सचु एकै ॥ बूझु गिआनी सतगुर की टेकै ॥ गुरमुखि विरली एको जाणिआ ॥ आवणु जाणा मेटि समाणिआ ॥८॥ जिन कै हिरदै एकंकारु ॥ सरब गुणी साचा बीचारु ॥ गुर कै भाणै करम कमावै ॥ नानक साचे साचि समावै ॥९॥४॥

अर्थ: हे पण्डित! तू (विवाह आदि समय में जजमानों के लिए) शुभ-लगन गिनता है, पर तू ये विचार नहीं करता कि शुभ-समय बनाने, ना बनाने वाला परमात्मा (स्वयं ही) है। जिस मनुष्य को गुरु मिल जाए वह जानता है (कि विवाह आदि का समय किस) ढंग (से शुभ बन सकता है)। जब मनुष्य को गुरु की शिक्षा प्राप्त हो जाए तब वह परमात्मा की रजा को समझ लेता है (और रज़ा को समझना ही शुभ-महूरत का मूल है)।1। हे पण्डित! (अपनी आजीविका की खातिर जजमानों को खुश करने के लिए विवाह आदि के समय में शुभ-महूरत आदि ढूँढने का) झूठ ना बोल। सच बोलना चाहिए। जब गुरु के शब्द में जुड़ के (अंदर ही) अहंकार दूर हो जाता है तब वह घर (सहज ही) मिल जाता है (जहाँ आत्मिक और सांसारिक सारे पदार्थ मिलते हैं)।1। रहाउ। (पण्डित) ज्योतिष (के लेखे) गिन-गिन के (किसी जजमान के पुत्र की) जनम-पत्री बनाता है, (ज्योतिष का हिसाब खुद) पढ़ता है और (जजमान को) सुनाता है पर अस्लियत को नहीं पहचानता। (शुभ-महूरत आदि के) सारे विचारों से उत्तम श्रेष्ठ विचार ये है कि मनुष्य गुरु के शब्द को मन में बसाए। मैं (गुरु-शब्द के मुकाबले में शुभ-महूरत व जनम-पत्री आदि किसी) और बात की परवाह नहीं करता, और सारी विचारें व्यर्थ हैं।2। (हे पण्डित!) तू (तीर्थ आदि पर) स्नान करता है (शरीर मल-मल के) धोता है, और पत्थर (के देवी-देवते) पूजता है, पर परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाए बिना (मन विकारों से) सदा मैला रहता है। (हे पण्डित!) जीवात्मा को विकारों से निजात दिलाने वाले और जीवन को सफल करने वाले परमात्मा का नाम जप, (नाम जप के) अहंकार दूर करने से (जीवन-रथ का) रथ-वाह (सारथी) प्रभु मिल जाता है।3। (पण्डित) वेद (आदिक धर्म-पुस्तकों) को (जीवन की अगुवाई के लिए) नहीं बिचारता, (अर्थ व कर्मकांड आदि की) बहस को ही पढ़ता है (इस तरह संसार-समुंदर की विकार-लहरों में डूबा रहता है), जो मनुष्य खुद डूबा रहे वह अपने (गुजर चुके) बुर्जुगों को (संसार-समुंदर में से) कैसे पार लंघा सकता है? कोई विरला मनुष्य ही पहचानता है कि परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है। जिस मनुष्य को गुरु मिल जाए, उसको ये (बात) समझ में आ जाती है।4। जैसे जैसे शुभ-अशुभ-महूरतों के लेखे गिनते रहें वैसे-वैसे जीवात्मा को हमेशा सहम का रोग लगा रहता है। जब मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है तब इसको आत्मिक आनंद मिलता है। पाप-अपराध करके भी जब हम परमात्मा की शरण आते हैं, तो परमात्मा हमारे पूर्बले कर्मों के अनुसार गुरु को मिला देता है (और गुरु सही जीवन-राह दिखाता है)।5। जब तक गुरु की शरण ना आएं तब तक परमात्मा नहीं मिलता, भटकना में गलत रास्ते पड़ के आत्मिक मौत ले के बार-बार जनम में आते रहते हैं। (गुरु की शरण के बिना जीव) जम के दर से बँधा हुआ व्यर्थ ही आत्मिक मौत मरता है, उसके हृदय में ना प्रभु का नाम बसता है ना गुरु का शब्द बसता है, ना ही उसका अच्छा आचरण बनता है।6। अनेक (कुलीन और विद्वान ब्राहमण) अपने आप को पांधे-पण्डित व मिश्र कहलवाते हैं, पर परमात्मा के बिना और ही आसरों की झाक में गलतान रहते हैं, परमात्मा दर-घर नहीं पा सकते। करोड़ों में से कोई ही वह व्यक्ति अद्वितीय है जिसको गुरु की कृपा से परमात्मा का नाम जिंदगी का आसरा मिल गया है।7। हे पण्डित! अगर तू ज्ञानवान बनता है तो गुरु का आसरा-परना ले के ये बात समझ ले कि (जगत में) चाहे कोई भला है चाहे बुरा है हरेक में सदा-स्थिर प्रभु ही मौजूद है। उन विरले लोगों ने हर जगह एक परमात्मा को ही व्यापक समझा है जो गुरु की शरण पड़े हैं। (गुरु-शरण की इनायत से) वे अपना जनम-मरण मिटा के प्रभु-चरणों में लीन रहते हैं।8। (गुरु की कृपा से) जिस मनुष्यों के हृदय में एक परमात्मा बसता है, सारे जीवों का मालिक सदा-स्थिर-प्रभु उनकी तवज्जो का हमेशा उद्देश्य बना रहता है। हे नानक! जो मनुष्य गुरु की रज़ा में चल के (अपने) सारे काम करता है (और शुभ-अशुभ महूरतों के वहम में नहीं पड़ता) वह सदा-स्थिर-परमात्मा में लीन रहता है (और उसको आत्मिक व सांसारिक पदार्थ उस दर से मिलते रहते हैं)।9।4।


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