अंग : 688
धनासरी महला १ ॥ जीवा तेरै नाइ मनि आनंदु है जीउ ॥ साचो साचा नाउ गुण गोविंदु है जीउ ॥ गुर गिआनु अपारा सिरजणहारा जिनि सिरजी तिनि गोई ॥ परवाणा आइआ हुकमि पठाइआ फेरि न सकै कोई ॥ आपे करि वेखै सिरि सिरि लेखै आपे सुरति बुझाई ॥ नानक साहिबु अगम अगोचरु जीवा सची नाई ॥१॥ तुम सरि अवरु न कोइ आइआ जाइसी जीउ ॥ हुकमी होइ निबेड़ु भरमु चुकाइसी जीउ ॥ गुरु भरमु चुकाए अकथु कहाए सच महि साचु समाणा ॥ आपि उपाए आपि समाए हुकमी हुकमु पछाणा ॥ सची वडिआई गुर ते पाई तू मनि अंति सखाई ॥ नानक साहिबु अवरु न दूजा नामि तेरै वडिआई ॥२॥ तू सचा सिरजणहारु अलख सिरंदिआ जीउ ॥ एकु साहिबु दुइ राह वाद वधंदिआ जीउ ॥ दुइ राह चलाए हुकमि सबाए जनमि मुआ संसारा ॥ नाम बिना नाही को बेली बिखु लादी सिरि भारा ॥ हुकमी आइआ हुकमु न बूझै हुकमि सवारणहारा ॥ नानक साहिबु सबदि सिञापै साचा सिरजणहारा ॥३॥ भगत सोहहि दरवारि सबदि सुहाइआ जीउ ॥ बोलहि अम्रित बाणि रसन रसाइआ जीउ ॥ रसन रसाए नामि तिसाए गुर कै सबदि विकाणे ॥ पारसि परसिऐ पारसु होए जा तेरै मनि भाणे ॥ अमरा पदु पाइआ आपु गवाइआ विरला गिआन वीचारी ॥ नानक भगत सोहनि दरि साचै साचे के वापारी ॥४॥ भूख पिआसो आथि किउ दरि जाइसा जीउ ॥ सतिगुर पूछउ जाइ नामु धिआइसा जीउ ॥ सचु नामु धिआई साचु चवाई गुरमुखि साचु पछाणा ॥ दीना नाथु दइआलु निरंजनु अनदिनु नामु वखाणा ॥ करणी कार धुरहु फुरमाई आपि मुआ मनु मारी ॥ नानक नामु महा रसु मीठा त्रिसना नामि निवारी ॥५॥२॥
अर्थ: हे प्रभू जी! तेरे नाम में (जुड़ के) मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है, मेरे मन में खुशी पैदा होती है। हे भाई! परमात्मा का नाम सदा स्थिर रहने वाला है, प्रभू गुणों (का खजाना) है और धरती के जीवों के दिलोंकी जानने वाला है। गुरू का बख्शा हुआ ज्ञान बताता है कि सृजनहार प्रभू बेअंत है, जिसने ये सृष्टि पैदा की है, वही इसका नाश करता है। जब उसके हुकम में भेजा हुआ आमंत्रण आता है तो कोई भी जीव (उसके बुलावे को) रोक नहीं सकता। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करके आप ही संभाल करता है, आप ही हरेक जीव के सिर पर (उसके किए कर्मों के अनुसार) लेख लिखता है, खुद ही (जीव को सही जीवन-राह की) सूझ बख्शता है। मालिक-प्रभू अपहुँच है, जीवों की ज्ञानेन्द्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती। हे नानक! (उसके दर पर अरदास कर, और कह– हे प्रभू!) तेरी सदा कायम रहने वाली सिफत सालाह करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है (मुझे अपनी सिफत सालाह बख्श)।1। हे प्रभू जी! तेरे बराबर का और कोई नहीं है, (और जो भी जगत में) आया है, (वह यहाँ से आखिर) चला जाएगा (तू ही सदा कायम रहने वाला है)। जिस मनुष्य की भटकना (गुरू) दूर करता है, प्रभू के हुकम अनुसार उसके जनम-मरण के चक्कर का खात्मा हो जाता है। गुरू जिसकी भटकना दूर करता है, उससे उस परमात्मा की सिफत सालाह करवाता है जिसके गुण बयान से परे हैं। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में रहता है, सदा स्थिर प्रभू (उसके हृदय में) प्रगट हो जाता है। वह मनुष्य रजा के मालिक प्रभू का हुकम पहचान लेता है (और समझ लेता है कि) प्रभू खुद ही पैदा करता है और खुद ही (अपने में) लीन कर लेता है। हे प्रभू! जिस मनुष्य ने तेरी सिफत सालाह (की दाति) गुरू से प्राप्त कर ली है, तू उसके मन में आ बसता है और अंत के समय भी उसका साथी बनता है। हे नानक! मालिक प्रभू सदा कायम रहने वाला है, उस जैसा कोई और नहीं। (उसके दर पर अरदास कर और कह–) हे प्रभू! तेरे नाम में जुड़ने से (लोक-परलोक में) आदर मिलता है।2। हे अदृष्य रचनहार! तू सदा स्थिर रहने वाला है और सब जीवों को पैदा करने वाला है। एक ही सृजनहार (सारे जगत का) मालिक है, उसने (पैदा होना और मरना) दो रास्ते चलाए हैं। (उसीकी रजा के अनुसार जगत में) झगड़े बढ़ते हैं। दोनों रास्ते प्रभू ने ही चलाए हैं, सारे जीव उसी के हुकम में हैं, (उसी के हुकम अनुसार) जगत पैदा होता व मरता रहता है। (जीव नाम को भुला के माया के मोह का) जहर-रूपी भार अपने सिर पर इकट्ठा किए जाता है, (और ये नहीं समझता कि) परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी साथी मित्र नहीं बन सकता। जीव (परमात्मा के) हुकम अनुसार (जगत में) आता है, (पर माया के मोह में फस के उस) हुकम को नहीं समझता। प्रभू आप ही जीवों को अपने हुकम अनुसार (सीधे रास्ते पर डाल के) सँवारने में समर्थ है। हे नानक! गुरू के शबद में जुड़ने से ये पहचान हो जाती है कि जगत का मालिक सदा-स्थिर रहने वाला है और सबको पैदा करने वाला है।3। हे भाई! परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा की हजूरी में शोभते हैं, क्योंकि गुरू के शबद की बरकति से वह अपने जीवन को सुंदर बना लेते हैं। वह लोग आत्मिक जीवन देने वाली बाणी अपनी जीभ से उचारते रहते हैं, जीव को उस बाणी के साथ एकरस कर लेते हैं। भक्त जन प्रभू के नाम के साथ जीभ को रसित कर लेते हैं, नाम में जुड़ के (नाम के वास्ते उनकी) प्यास बढ़ती है, गुरू के शबद से वह प्रभू-नाम से कुर्बान होते हैं, (नाम की खातिर और सब शारीरिक सुख कुर्बान करते हैं)। हे प्रभू! जब (भक्तजन) तेरे मन को प्यारे लगते हैं, तो वह गुरू पारस से छू के स्वयं भी पारस बन जाते हैं (औरों को पवित्र जीवन देने के लायक बन जाते हैं)। जो लोग स्वैभाव दूर करते हैं उन्हें वह आत्मिक दर्जा मिल जाता है जहाँ आत्मिक मौत असर नहीं कर सकती। पर ऐसा कोई विरला ही गुरू के दिए ज्ञान की विचार करने वाला सख्श होता है। हे नानक! परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे सदा-स्थिर प्रभू के दर पर शोभा पाते हैं, वह (अपने सारे जीवन में) सदा-स्थिर प्रभू के नाम का ही व्यापार करते हैं।4। जब तक मैं माया के वास्ते भूखा प्यासा रहता हूँ, तब तक मैं किसी भी तरह प्रभू के दर पर पहुँच नहीं सकता। (माया की तृष्णा दूर करने का इलाज) मैं जा के अपने गुरू से पूछता हूँ (और उसकी शिक्षा के अनुसार) मैं परमात्मा का नाम सिमरता हूँ (नाम ही तृष्णा दूर करता है)। गुरू की शरण पड़ कर मैं सदा-स्थिर नाम सिमरता हूँ सदा-स्थिर प्रभू (की सिफत सालाह) उचारता हूँ, और सदा स्थिर प्रभू से सांझ पाता हूँ। मैं हर रोज उस प्रभू का नाम मुँह से बोलता हूँ जो दीनों का सहारा है जो दया का श्रोत है और जिस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता। परमात्मा ने जिस मनुष्य को अपनी हजूरी से ही नाम-सिमरन का करणीय कार्य करने का हुकम दे दिया, वह मनुष्य अपने मन को (माया की ओर से) मार के तृष्णा के प्रभाव से बच जाता है। हे नानक! उस मनुष्य को प्रभू का नाम ही मीठा व सभी रसों से श्रेष्ठ लगता है, उसने नाम-सिमरन की बरकति से माया की तृष्णा (अपने अंदर से) दूर कर ली होती है।5।2।
ਅੰਗ : 555
ਸਲੋਕ ਮ: ੩ ॥ ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਜਗਤੁ ਮੁਆ ਮਰਦੋ ਮਰਦਾ ਜਾਇ ॥ਜਿਚਰੁ ਵਿਚਿ ਦੰਮੁ ਹੈ ਤਿਚਰੁ ਨ ਚੇਤਈ ਕਿ ਕਰੇਗੁ ਅਗੈ ਜਾਇ ॥ ਗਿਆਨੀ ਹੋਇ ਸੁ ਚੇਤੰਨੁ ਹੋਇ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੁ ਕਮਾਇ ॥ ਨਾਨਕ ਏਥੈ ਕਮਾਵੈ ਸੋ ਮਿਲੈ ਅਗੈ ਪਾਏ ਜਾਇ ॥੧॥ ਮਃ ੩ ॥ ਧੁਰਿ ਖਸਮੈ ਕਾ ਹੁਕਮੁ ਪਇਆ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਚੇਤਿਆ ਨ ਜਾਇ ॥ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਅੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਦਾ ਰਹਿਆ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥ ਦਮਿ ਦਮਿ ਸਦਾ ਸਮਾਲਦਾ ਦੰਮੁ ਨ ਬਿਰਥਾ ਜਾਇ ॥ ਜਨਮ ਮਰਨ ਕਾ ਭਉ ਗਇਆ ਜੀਵਨ ਪਦਵੀ ਪਾਇ ॥ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਮਰਤਬਾ ਤਿਸ ਨੋ ਦੇਇ ਜਿਸ ਨੋ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਰਜਾਇ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਆਪੇ ਦਾਨਾਂ ਬੀਨਿਆ ਆਪੇ ਪਰਧਾਨਾਂ ॥ ਆਪੇ ਰੂਪ ਦਿਖਾਲਦਾ ਆਪੇ ਲਾਇ ਧਿਆਨਾਂ ॥ ਆਪੇ ਮੋਨੀ ਵਰਤਦਾ ਆਪੇ ਕਥੈ ਗਿਆਨਾਂ ॥ ਕਉੜਾ ਕਿਸੈ ਨ ਲਗਈ ਸਭਨਾ ਹੀ ਭਾਨਾ ॥ ਉਸਤਤਿ ਬਰਨਿ ਨ ਸਕੀਐ ਸਦ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨਾ ॥੧੯॥
ਅਰਥ: ਸੰਸਾਰ ਹਉਮੈ ਵਿਚ ਮੁਇਆ ਪਿਆ ਹੈ, ਨਿੱਤ (ਹਿਠਾਂ ਹਿਠਾਂ) ਪਿਆ ਗਰਕਦਾ ਹੀ ਹੈ; ਜਦ ਤਾਈਂ ਸਰੀਰ ਵਿਚ ਦਮ ਹੈ, ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਯਾਦ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ; (ਸੰਸਾਰੀ ਜੀਵ ਹਉਮੈ ਵਿਚ ਰਹਿ ਕੇ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਸੋਚਦਾ ਕਿ) ਅਗਾਂਹ ਦਰਗਾਹ ਵਿਚ ਜਾ ਕੇ ਕੀਹ ਹਾਲ ਹੋਵੇਗਾ। ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਗਿਆਨਵਾਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਸੁਚੇਤ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਅਗਿਆਨੀ ਮਨੁੱਖ ਅਗਿਆਨਤਾ ਦਾ ਕੰਮ ਹੀ ਕਰਦਾ ਹੈ; ਹੇ ਨਾਨਕ! ਮਨੁੱਖਾ ਜਨਮ ਵਿਚ ਜੋ ਕੁਝ ਮਨੁੱਖ ਕਮਾਈ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹੋ ਮਿਲਦੀ ਹੈ, ਪਰਲੋਕ ਵਿਚ ਭੀ ਜਾ ਕੇ ਉਹੋ ਮਿਲਦੀ ਹੈ।੧। ਧੁਰੋਂ ਹੀ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਹੁਕਮ ਚਲਿਆ ਆਉਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਤਿਗੁਰੂ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਪ੍ਰਭੂ ਸਿਮਰਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ; ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੇ ਮਿਲਿਆਂ ਪ੍ਰਭੂ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਵੱਸ ਪੈਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਮਨੁੱਖ ਸਦਾ ਉਸ ਵਿਚ ਬਿਰਤੀ ਜੋੜੀ ਰੱਖਦਾ ਹੈ; ਸੁਆਸ ਸੁਆਸ ਉਸ ਨੂੰ ਚੇਤਦਾ ਹੈ, ਇੱਕ ਭੀ ਸੁਆਸ ਖ਼ਾਲੀ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦਾ; (ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਸ ਦਾ) ਜੰਮਣ ਮਰਨ ਦਾ ਡਰ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਉਸ ਨੂੰ (ਅਸਲ ਮਨੁੱਖਾ) ਜੀਵਨ ਦਾ ਮਰਤਬਾ ਮਿਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ! ਪ੍ਰਭੂ ਇਹ ਦਰਜਾ (ਭਾਵ, ਜੀਵਨ-ਪਦਵੀ) ਉਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਦੇਂਦਾ ਹੈ ਜਿਸ ਤੇ ਆਪਣੀ ਰਜ਼ਾ ਵਿਚ ਮੇਹਰ ਕਰਦਾ ਹੈ।੨। ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਹੀ ਸਿਆਣਾ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ ਚਤੁਰ ਹੈ ਤੇ ਆਪ ਹੀ ਆਗੂ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ (ਆਪਣੇ) ਰੂਪ ਵਿਖਾਲਦਾ ਹੈ ਤੇ ਆਪ ਹੀ ਬਿਰਤੀ ਜੋੜਦਾ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ ਮੋਨਧਾਰੀ ਹੈ ਤੇ ਆਪ ਹੀ ਗਿਆਨ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕੌੜਾ ਨਹੀਂ ਲੱਗਦਾ (ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਰੰਗ ਵਿਚ, ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਰੰਗ ਵਿਚ) ਸਭਨਾਂ ਨੂੰ ਪਿਆਰਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ। ਐਸੇ ਪ੍ਰਭੂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਸਦਕੇ ਹਾਂ, ਉਸ ਦੇ ਗੁਣ ਬਿਆਨ ਨਹੀਂ ਕੀਤੇ ਜਾ ਸਕਦੇ।੧੯।
अंग : 555
सलोक मः ३ ॥ हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥ जिचरु विचि दमु है तिचरु न चेतई कि करेगु अगै जाइ ॥ गिआनी होइ सु चेतंनु होइ अगिआनी अंधु कमाइ ॥ नानक एथै कमावै सो मिलै अगै पाए जाइ ॥१॥ मः ३ ॥ धुरि खसमै का हुकमु पइआ विणु सतिगुर चेतिआ न जाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ अंतरि रवि रहिआ सदा रहिआ लिव लाइ ॥ दमि दमि सदा समालदा दमु न बिरथा जाइ ॥ जनम मरन का भउ गइआ जीवन पदवी पाइ ॥ नानक इहु मरतबा तिस नो देइ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥२॥ पउड़ी ॥ आपे दानां बीनिआ आपे परधानां ॥ आपे रूप दिखालदा आपे लाइ धिआनां ॥ आपे मोनी वरतदा आपे कथै गिआनां ॥ कउड़ा किसै न लगई सभना ही भाना ॥ उसतति बरनि न सकीऐ सद सद कुरबाना ॥१९॥
अर्थ: संसार अहंकार में मरा पड़ा है, नित्य (नीचे ही नीचे) गरकता ही है। जब तक शरीर में दम है, प्रभू को याद नहीं करता; (संसारी जीव अहंकार में रह के कभी नहीं सोचता कि) आगे दरगाह में जा के क्या हाल होगा। जो मनुष्य दयावान होता है, वह सचेत रहता है और अज्ञानी मनुष्य अज्ञानता का ही काम करता है। हे नानक! मानस जनम में जो कुछ मनुष्य कमाई करता है, वही मिलती है, परलोक में जा के भी वही मिलती है।1। धुर से ही प्रभू का हुकम चला आ रहा है कि सतिगुरू के बिना प्रभू का सिमरन नहीं किया जा सकता; सतिगुरू के मिलने पर प्रभू मनुष्य के हृदय में बस जाता है और मनुष्य सदा उसमें बिरती जोड़े रखता है; श्वास-श्वास उसको चेता करता है, एक भी श्वास व्यर्थ नहीं जाता; (इस तरह उसका) पैदा होने मरने का डर खत्म हो जाता है और उसको (असल मानस) जीवन का दर्जा मिल जाता है। हे नानक! प्रभू ये मर्तबा (भाव, जीवन पदवी) उस मनुष्य को देता है जिस पर अपनी रजा में मेहर करता है।2। प्रभू खुद ही समझदार है, खुद ही चतुर है और खुद ही नायक है, खुद ही (अपने) रूप दिखलाता है और खुद ही बिरती जोड़ता है, खुद ही मौनधारी है और खुद ही ज्ञान की बातें करने वाला है, किसी को कड़वा नहीं लगता (किसी को किसी रंग में, किसी को किसी रंग में) सभी को प्यारा लगता है। ऐसे प्रभू से मैं सदके हूँ, उसके गुण बयान नहीं किए जा सकते।19।
ਅੰਗ : 694
ਧਨਾਸਰੀ ਭਗਤ ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕੀ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਹਮ ਸਰਿ ਦੀਨੁ ਦਇਆਲੁ ਨ ਤੁਮ ਸਰਿ ਅਬ ਪਤੀਆਰੁ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ॥ ਬਚਨੀ ਤੋਰ ਮੋਰ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ਜਨ ਕਉ ਪੂਰਨੁ ਦੀਜੈ ॥੧॥ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ਰਮਈਆ ਕਾਰਨੇ ॥ ਕਾਰਨ ਕਵਨ ਅਬੋਲ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਬਹੁਤ ਜਨਮ ਬਿਛੁਰੇ ਥੇ ਮਾਧਉ ਇਹੁ ਜਨਮੁ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰੇ ਲੇਖੇ ॥ ਕਹਿ ਰਵਿਦਾਸ ਆਸ ਲਗਿ ਜੀਵਉ ਚਿਰ ਭਇਓ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖੇ ॥੨॥੧॥
ਅਰਥ: (ਹੇ ਮਾਧੋ!) ਮੇਰੇ ਵਰਗਾ ਕੋਈ ਨਿਮਾਣਾ ਨਹੀਂ, ਤੇ, ਤੇਰੇ, ਵਰਗਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਦਇਆ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਨਹੀਂ, (ਮੇਰੀ ਕੰਗਾਲਤਾ ਦਾ) ਹੁਣ ਹੋਰ ਪਰਤਾਵਾ ਕਰਨ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ। (ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ!) ਮੈਨੂੰ ਦਾਸ ਨੂੰ ਇਹ ਪੂਰਨ ਸਿਦਕ ਬਖ਼ਸ਼ ਕਿ ਮੇਰਾ ਮਨ ਤੇਰੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਵਿਚ ਪਰਚ ਜਾਇਆ ਕਰੇ।੧। ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ! ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਸਦਾ ਸਦਕੇ ਹਾਂ; ਤੂੰ ਕਿਸ ਗੱਲੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਬੋਲਦਾ?।ਰਹਾਉ। ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ -ਹੇ ਮਾਧੋ! ਕਈ ਜਨਮਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਵਿਛੁੜਿਆ ਆ ਰਿਹਾ ਹਾਂ (ਮਿਹਰ ਕਰ, ਮੇਰਾ) ਇਹ ਜਨਮ ਤੇਰੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਬੀਤੇ; ਤੇਰਾ ਦੀਦਾਰ ਕੀਤਿਆਂ ਬੜਾ ਚਿਰ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, (ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ) ਆਸ ਵਿਚ ਹੀ ਮੈਂ ਜੀਊਂਦਾ ਹਾਂ ॥੨॥੧॥
अंग : 694
धनासरी, भगत रवि दास जी की ੴ सतिगुर परसाद हम सरि दीनु दइआल न तुम सरि अब पतिआरू किया कीजे ॥ बचनी तोर मोर मनु माने जन कऊ पूरण दीजे ॥१॥ हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥ कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥ बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ॥ कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥२॥१॥
अर्थ: (हे माधो मेरे जैसा कोई दीन और कंगाल नहीं हे और तेरे जैसा कोई दया करने वाला नहीं, (मेरी कंगालता का) अब और परतावा करने की जरुरत नहीं (हे सुंदर राम!) मुझे दास को यह सिदक बक्श की मेरा मन तेरी सिफत सलाह की बाते करने में ही लगा रहे।१। हे सुंदर राम! में तुझसे सदके हूँ, तू किस कारण मेरे साथ नहीं बोलता?||रहाउ|| रविदास जी कहते हैं- हे माधो! कई जन्मो से मैं तुझ से बिछुड़ा आ रहा हूँ (कृपा कर, मेरा) यह जनम तेरी याद में बीते; तेरा दीदार किये बहुत समां हो गया है, (दर्शन की) आस में जीवित हूँ॥२॥१॥
ਅੰਗ : 694
ਧਨਾਸਰੀ ਭਗਤ ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕੀ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਹਮ ਸਰਿ ਦੀਨੁ ਦਇਆਲੁ ਨ ਤੁਮ ਸਰਿ ਅਬ ਪਤੀਆਰੁ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ॥ ਬਚਨੀ ਤੋਰ ਮੋਰ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ਜਨ ਕਉ ਪੂਰਨੁ ਦੀਜੈ ॥੧॥ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ਰਮਈਆ ਕਾਰਨੇ ॥ ਕਾਰਨ ਕਵਨ ਅਬੋਲ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਬਹੁਤ ਜਨਮ ਬਿਛੁਰੇ ਥੇ ਮਾਧਉ ਇਹੁ ਜਨਮੁ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰੇ ਲੇਖੇ ॥ ਕਹਿ ਰਵਿਦਾਸ ਆਸ ਲਗਿ ਜੀਵਉ ਚਿਰ ਭਇਓ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖੇ ॥੨॥੧॥
ਅਰਥ: (ਹੇ ਮਾਧੋ!) ਮੇਰੇ ਵਰਗਾ ਕੋਈ ਨਿਮਾਣਾ ਨਹੀਂ, ਤੇ, ਤੇਰੇ, ਵਰਗਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਦਇਆ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਨਹੀਂ, (ਮੇਰੀ ਕੰਗਾਲਤਾ ਦਾ) ਹੁਣ ਹੋਰ ਪਰਤਾਵਾ ਕਰਨ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ। (ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ!) ਮੈਨੂੰ ਦਾਸ ਨੂੰ ਇਹ ਪੂਰਨ ਸਿਦਕ ਬਖ਼ਸ਼ ਕਿ ਮੇਰਾ ਮਨ ਤੇਰੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਵਿਚ ਪਰਚ ਜਾਇਆ ਕਰੇ।੧। ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ! ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਸਦਾ ਸਦਕੇ ਹਾਂ; ਤੂੰ ਕਿਸ ਗੱਲੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਬੋਲਦਾ?।ਰਹਾਉ। ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ -ਹੇ ਮਾਧੋ! ਕਈ ਜਨਮਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਵਿਛੁੜਿਆ ਆ ਰਿਹਾ ਹਾਂ (ਮਿਹਰ ਕਰ, ਮੇਰਾ) ਇਹ ਜਨਮ ਤੇਰੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਬੀਤੇ; ਤੇਰਾ ਦੀਦਾਰ ਕੀਤਿਆਂ ਬੜਾ ਚਿਰ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, (ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ) ਆਸ ਵਿਚ ਹੀ ਮੈਂ ਜੀਊਂਦਾ ਹਾਂ ॥੨॥੧॥
अंग : 694
धनासरी, भगत रवि दास जी की ੴ सतिगुर परसाद हम सरि दीनु दइआल न तुम सरि अब पतिआरू किया कीजे ॥ बचनी तोर मोर मनु माने जन कऊ पूरण दीजे ॥१॥ हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥ कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥ बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ॥ कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥२॥१॥
अर्थ: (हे माधो मेरे जैसा कोई दीन और कंगाल नहीं हे और तेरे जैसा कोई दया करने वाला नहीं, (मेरी कंगालता का) अब और परतावा करने की जरुरत नहीं (हे सुंदर राम!) मुझे दास को यह सिदक बक्श की मेरा मन तेरी सिफत सलाह की बाते करने में ही लगा रहे।१। हे सुंदर राम! में तुझसे सदके हूँ, तू किस कारण मेरे साथ नहीं बोलता?||रहाउ|| रविदास जी कहते हैं- हे माधो! कई जन्मो से मैं तुझ से बिछुड़ा आ रहा हूँ (कृपा कर, मेरा) यह जनम तेरी याद में बीते; तेरा दीदार किये बहुत समां हो गया है, (दर्शन की) आस में जीवित हूँ॥२॥१॥

