ਅੰਗ : 668
ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥ ਕਲਿਜੁਗ ਕਾ ਧਰਮੁ ਕਹਹੁ ਤੁਮ ਭਾਈ ਕਿਵ ਛੂਟਹ ਹਮ ਛੁਟਕਾਕੀ ॥ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪੁ ਬੇੜੀ ਹਰਿ ਤੁਲਹਾ ਹਰਿ ਜਪਿਓ ਤਰੈ ਤਰਾਕੀ ॥੧॥ ਹਰਿ ਜੀ ਲਾਜ ਰਖਹੁ ਹਰਿ ਜਨ ਕੀ ॥ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪਨੁ ਜਪਾਵਹੁ ਅਪਨਾ ਹਮ ਮਾਗੀ ਭਗਤਿ ਇਕਾਕੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਹਰਿ ਕੇ ਸੇਵਕ ਸੇ ਹਰਿ ਪਿਆਰੇ ਜਿਨ ਜਪਿਓ ਹਰਿ ਬਚਨਾਕੀ ॥ ਲੇਖਾ ਚਿਤ੍ਰ ਗੁਪਤਿ ਜੋ ਲਿਖਿਆ ਸਭ ਛੂਟੀ ਜਮ ਕੀ ਬਾਕੀ ॥੨॥ ਹਰਿ ਕੇ ਸੰਤ ਜਪਿਓ ਮਨਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਲਗਿ ਸੰਗਤਿ ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੀ ॥ ਦਿਨੀਅਰੁ ਸੂਰੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਨੀ ਸਿਵ ਚਰਿਓ ਚੰਦੁ ਚੰਦਾਕੀ ॥੩॥ ਤੁਮ ਵਡ ਪੁਰਖ ਵਡ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਤੁਮ ਆਪੇ ਆਪਿ ਅਪਾਕੀ ॥ ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਕੀਜੈ ਕਰਿ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸ ਦਸਾਕੀ ॥੪॥੬॥
ਅਰਥ: ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ ਜੀ! (ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦੇ ਝੰਬੇਲਿਆਂ ਵਿਚੋਂ) ਆਪਣੇ ਸੇਵਕ ਦੀ ਇੱਜ਼ਤ ਬਚਾ ਲੈ। ਹੇ ਹਰੀ! ਮੈਨੂੰ ਆਪਣਾ ਨਾਮ ਜਪਣ ਦੀ ਸਮਰਥਾ ਦੇਹ। ਮੈਂ (ਤੇਰੇ ਪਾਸੋਂ) ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੀ ਭਗਤੀ ਦਾ ਦਾਨ ਮੰਗ ਰਿਹਾ ਹਾਂ। ਰਹਾਉ। ਹੇ ਭਾਈ! ਮੈਨੂੰ ਉਹ ਧਰਮ ਦੱਸ ਜਿਸ ਨਾਲ ਜਗਤ ਦੇ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦੇ ਝੰਬੇਲਿਆਂ ਵਿਚੋਂ ਬਚਿਆ ਜਾ ਸਕੇ। ਮੈਂ ਇਹਨਾਂ ਝੰਬੇਲਿਆਂ ਤੋਂ ਬਚਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ। ਦੱਸ; ਮੈਂ ਕਿਵੇਂ ਬਚਾਂ? (ਉੱਤਰ—) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਜਾਪ ਬੇੜੀ ਹੈ, ਨਾਮ ਹੀ ਤੁਲਹਾ ਹੈ। ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੇ ਹਰਿ-ਨਾਮ ਜਪਿਆ ਉਹ ਤਾਰੂ ਬਣ ਕੇ (ਸੰਸਾਰ-ਸਮੁੰਦਰ ਤੋਂ) ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।1। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਮਨੁੱਖਾਂ ਨੇ ਗੁਰੂ ਦੇ ਬਚਨਾਂ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਜਪਿਆ, ਉਹ ਸੇਵਕ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ ਪਿਆਰੇ ਲੱਗਦੇ ਹਨ। ਚਿੱਤਰ ਗੁਪਤ ਨੇ ਜੇਹੜਾ ਭੀ ਉਹਨਾਂ (ਦੇ ਕਰਮਾਂ) ਦਾ ਲੇਖ ਲਿਖ ਰੱਖਿਆ ਸੀ, ਧਰਮਰਾਜ ਦਾ ਉਹ ਸਾਰਾ ਹਿਸਾਬ ਹੀ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।2। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਸੰਤ ਜਨਾਂ ਨੇ ਸਾਧ ਜਨਾਂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ ਬੈਠ ਕੇ ਆਪਣੇ ਮਨ ਵਿਚ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਜਾਪ ਕੀਤਾ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਕੱਲਿਆਣ ਰੂਪ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਪਰਗਟ ਹੋ ਪਿਆ,ਮਾਨੋ) ਠੰਢਕ ਪੁਚਾਣ ਵਾਲਾ ਚੰਦ ਚੜ੍ਹ ਪਿਆ, ਜਿਸ ਨੇ (ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚੋਂ) ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੀ ਅੱਗ ਬੁਝਾ ਦਿੱਤੀ; (ਜਿਸ ਨੇ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦਾ) ਤਪਦਾ ਸੂਰਜ (ਸ਼ਾਂਤ ਕਰ ਦਿੱਤਾ)।3। ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਤੂੰ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਹੈਂ, ਤੂੰ ਸਰਬ-ਵਿਆਪਕ ਹੈਂ; ਤੂੰ ਅਪਹੁੰਚ ਹੈਂ; ਗਿਆਨ-ਇੰਦ੍ਰਿਆਂ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਤੇਰੇ ਤਕ ਪਹੁੰਚ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀ। ਤੂੰ (ਹਰ ਥਾਂ) ਆਪ ਹੀ ਆਪ, ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਹੈਂ। ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਆਪਣੇ ਦਾਸ ਨਾਨਕ ਉਤੇ ਮੇਹਰ ਕਰ, ਤੇ, ਆਪਣੇ ਦਾਸਾਂ ਦੇ ਦਾਸਾਂ ਦਾ ਦਾਸ ਬਣਾ ਲੈ।4।6।

अंग : 668
धनासरी महला ४ ॥ कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥ हरि हरि जपु बेड़ी हरि तुलहा हरि जपिओ तरै तराकी ॥१॥ हरि जी लाज रखहु हरि जन की ॥ हरि हरि जपनु जपावहु अपना हम मागी भगति इकाकी ॥ रहाउ ॥ हरि के सेवक से हरि पिआरे जिन जपिओ हरि बचनाकी ॥ लेखा चित्र गुपति जो लिखिआ सभ छूटी जम की बाकी ॥२॥ हरि के संत जपिओ मनि हरि हरि लगि संगति साध जना की ॥ दिनीअरु सूरु त्रिसना अगनि बुझानी सिव चरिओ चंदु चंदाकी ॥३॥ तुम वड पुरख वड अगम अगोचर तुम आपे आपि अपाकी ॥ जन नानक कउ प्रभ किरपा कीजै करि दासनि दास दसाकी ॥४॥६॥
अर्थ: हे भगवान जी ! (दुनिया के विकारों के झंझटों में से) अपने सेवक की इज्ज़त बचा ले। हे हरि ! मुझे अपना नाम जपने की समरथा दे। मैं (तेरे से) सिर्फ तेरी भक्ति का दान मांग रहा हूँ।रहाउ। हे भाई ! मुझे वह धर्म बता जिस के साथ जगत के विकारों के झंझटों से बचा जा सके। मैं इन झंझटों से बचना चाहता हूँ। बता; मैं कैसे बचूँ? (उत्तर-) परमात्मा के नाम का जाप कश्ती है,नाम ही तुलहा है। जिस मनुख ने हरि-नाम जपा वह तैराक बन के (संसार-सागर से) पार निकल जाता है।1। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरु के वचनों के द्वारा परमात्मा का नाम जपा, वह सेवक परमात्मा को प्यारे लगते हैं। चित्र गुप्त ने जो भी उन (के कर्मो) का लेख लिख रखा था, धर्मराज का वह सारा हिसाब ही खत्म हो जाता है।2। हे भाई ! जिन संत जनों ने साध जनों की संगत में बैठ के अपने मन में परमात्मा के नाम का जाप किया, उन के अंदर कलिआण रूप (परमात्मा प्रकट हो गया, मानो) ठंडक पहुचाने वाला चाँद चड़ गया, जिस ने (उन के मन में से) तृष्णा की अग्नि बुझा दी; (जिस ने विकारों का) तपता सूरज (शांत कर दिया)।3। हे भगवान ! तूं सब से बड़ा हैं, तूं सर्व-व्यापक हैं; तूं अपहुंच हैं; ज्ञान-इन्द्रियों के द्वारा तेरे तक पहुंच नहीं हो सकती। तूं (हर जगह) आप ही आप हैं। हे भगवान ! अपने दास नानक ऊपर कृपा कर, और, अपने दासो के दासो का दास बना ले।4।6।

ਅੰਗ : 639
सोरठि महला ५ घरु १ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सभु जगु जिनहि उपाइआ भाई करण कारण समरथु ॥ जीउ पिंडु जिनि साजिआ भाई दे करि अपणी वथु ॥ किनि कहीऐ किउ देखीऐ भाई करता एकु अकथु ॥ गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई जिस ते जापै तथु ॥१॥ मेरे मन जपीऐ हरि भगवंता ॥ नामु दानु देइ जन अपने दूख दरदा का हंता ॥ रहाउ ॥ जा कै घरि सभु किछु है भाई नउ निधि भरे भंडार ॥ तिस की कीमति ना पवै भाई ऊचा अगम अपार ॥ जीअ जंत प्रतिपालदा भाई नित नित करदा सार ॥ सतिगुरु पूरा भेटीऐ भाई सबदि मिलावणहार ॥२॥ सचे चरण सरेवीअहि भाई भ्रमु भउ होवै नासु ॥ मिलि संत सभा मनु मांजीऐ भाई हरि कै नामि निवासु ॥ मिटै अंधेरा अगिआनता भाई कमल होवै परगासु ॥ गुर बचनी सुखु ऊपजै भाई सभि फल सतिगुर पासि ॥३॥ मेरा तेरा छोडिऐ भाई होईऐ सभ की धूरि ॥ घटि घटि ब्रहमु पसारिआ भाई पेखै सुणै हजूरि ॥ जितु दिनि विसरै पारब्रहमु भाई तितु दिनि मरीअै झूरि ॥ करन करावन समरथो भाई सरब कला भरपूरि ॥४॥ प्रेम पदारथु नामु है भाई माइआ मोह बिनासु ॥ तिसु भावै ता मेलि लए भाई हिरदै नाम निवासु ॥ गुरमुखि कमलु प्रगासीऐ भाई रिदै होवै परगासु ॥ प्रगटु भइआ परतापु प्रभ भाई मउलिआ धरति अकासु ॥५॥ गुरि पूरै संतोखिआ भाई अहिनिसि लागा भाउ ॥ रसना रामु रवै सदा भाई साचा सादु सुआउ ॥ करनी सुणि सुणि जीविआ भाई निहचलु पाइआ थाउ ॥ जिसु परतीति न आवई भाई सो जीअड़ा जलि जाउ ॥६॥ बहु गुण मेरे साहिबै भाई हउ तिस कै बलि जाउ ॥ ओहु निरगुणीआरे पालदा भाई देइ निथावे थाउ ॥ रिजकु संबाहे सासि सासि भाई गूड़ा जा का नाउ ॥ जिसु गुरु साचा भेटीऐ भाई पूरा तिसु करमाउ ॥७॥ तिसु बिनु घड़ी न जीवीऐ भाई सरब कला भरपूरि ॥ सासि गिरासि न विसरै भाई पेखउ सदा हजूरि ॥ साधू संगि मिलाइआ भाई सरब रहिआ भरपूरि ॥ जिना प्रीति न लगीआ भाई से नित नित मरदे झूरि ॥८॥ अंचलि लाइ तराइआ भाई भउजलु दुखु संसारु ॥ करि किरपा नदरि निहालिआ भाई कीतोनु अंगु अपारु ॥ मनु तनु सीतलु होइआ भाई भोजनु नाम अधारु ॥ नानक तिसु सरणागती भाई जि किलबिख काटणहारु ॥९॥१॥
ਅਰਥ: हे मेरे मन! (हमेशा) हरी भगवान का नाम जपना चाहिए। वह भगवान अपने सेवक को अपने नाम की दाति देता है। वह सारी दुख-पीड़ाओं को नाश करने वाला है। रहाउ। हे भाई! जिस परमात्मा ने आप ही सारा जगत पैदा किया है, जो सारे जगत का मूल है, जो सारी शक्तियों का मालिक है, जिसने अपनी वस्तु (सक्ता) दे के (मनुष्य की) जीवात्मा और शरीर पैदा किए हैं, वह करतार (तो) किसी भी पक्ष से बयान नहीं किया जा सकता। हे भाई उस करतार का रूप बताया नहीं जा सकता। उसे कैसे देखा जाए? हे भाई! गोबिंद के रूप गुरू की सिफत करनी चाहिए, क्योंकि गुरू से ही सारे जगत के मूल परमात्मा की सूझ पड़ सकती है।१। हे भाई! जिस प्रभू के घर में हरेक चीज मौजूद है, जिस के घर में जगत के सारे नौ ही खजाने विद्यमान हैं, जिसके घर में भंडारे भरे पड़े हैं, उसका मूल्य नहीं आंका जा सकता। वह सबसे ऊँचा है, वह अपहुँच है, वह बेअंत है। हे भाई! वह प्रभू सारे जीवों की पालना करता है, वह सदा ही (सब जीवों की) संभाल करता है। (उसका दर्शन करने के लिए) हे भाई! पूरे गुरू को मिलना चाहिए, (गुरू ही अपने) शबद में जोड़ के परमात्मा के साथ मिला सकने वाला है।२। हे भाई! सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के चरण हृदय में बसा के रखने चाहिए, (इस तरह मन के) भ्रम का (भटकना का) (हरेक किस्म के) डर का नाश हो जाता है। हे भाई! साध-संगति में मिल के मन को साफ करना चाहिए (इस तरह) परमात्मा के नाम में (मन का) निवास हो जाता है। (साध-संगति की बरकति से) हे भाई! आत्मिक जीवन के पक्ष से अज्ञानता का अंधकार (मनुष्य के अंदर से) मिट जाता है (हृदय का) कमल पुष्प खिल उठता है। हे भाई! गुरू के बचनों पर चलने से आत्मिक आनंद पैदा होता है। सारे फल गुरू के पास हैं।३। हे भाई! भेद भाव त्याग देने चाहिए, सबके चरणों की धूड़ बन जाना चाहिए। हे भाई! परमात्मा हरेक शरीर में बस रहा है, वह सबके अंग-संग हो के (सबके कामों को) देखता है (सबकी बातें) सुनता है। हे भाई! जिस दिन परमात्मा भूल जाए, उस दिन दुखी हो के (हम) आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। हे भाई! (ये याद रखो कि) परमात्मा सब कुछ कर सकने वाला है और (जीवों से) करवा सकने वाला है। परमात्मा में सारी ताकतें मौजूद हैं।४। हे भाई! (जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के) प्यार का कीमती धन मौजूद है, हरी-नाम मौजूद है (उसके अंदर से) माया के मोह का नाश हो जाता है। हे भाई! उस परमात्मा को (जब) अच्छा लगे तब वह (जिसको अपने चरणों में) मिला लेता है (उसके) हृदय में उस प्रभू के नाम का निवास हो जाता है। हे भाई! गुरू के सन्मुख होने से (हृदय का) कमल फूल खिल उठता है, दिल में (आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश हो जाता है। हे भाई! (गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य के अंदर) परमात्मा की ताकत प्रकट हो जाती है (मनुष्य को समझ आ जाता है कि परमात्मा बेअंत शक्तियों का मालिक है, और प्रभू की ताकत से ही) धरती खिली हुई है, आकाश खिला हुआ है।५। हे भाई! जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने संतोख की दाति दे दी, (उसके अंदर) दिन रात (प्रभू चरनों का) प्यार बना रहता है, वह मनुष्य सदा (अपनी) जीभ से परमात्मा का नाम जपता रहता है। (नाम जपने का ये) स्वाद (ये) निशाना (उसके अंदर) सदा कायम रहता है। हे भाई! वह मनुष्य अपने कानों से (परमात्मा की सिफत सालाह) सुन-सुन के आत्मिक जीवन हासिल करता रहता है, (वह प्रभू-चरणों में) अटल स्थान की प्राप्ति बनाए रहता है। पर, हे भाई! जिस मनुष्य को (गुरू पर) ऐतबार नहीं होता उसकी (दुर्भाग्यपूर्ण) जीवात्मा (विकारों में) जल जाती है (और आत्मिक मौत सहेड़ लेती है)।६। हे भाई! मेरे मालिक प्रभू में बेअंत गुण हैं, मैं उससे सदके-कुर्बान जाता हूँ। हे भाई! वह मालिक गुणहीन को (भी) पालता है, वह निआसरे मनुष्य को सहारा देता है। वह मालिक हरेक सांस के साथ रिजक पहुँचाता है, उसका नाम (सिमरन करने वाले के मन पर प्रेम का) गाढ़ा रंग चढ़ा देता है। हे भाई! जिस मनुष्य को सच्चा गुरू मिल जाता है (उसको प्रभू मिल जाता है) उसकी किस्मत जाग जाती है।७। हे भाई! वह परमात्मा सारी ही ताकतों से भरपूर है, उस (की याद) के बिना एक घड़ी भी (मनुष्य का) आत्मिक जीवन कायम नहीं रह सकता। हे भाई! मैं तो उस परमात्मा को अपने अंग-संग बसता देखता हूँ, मुझे वह खाते हुए सांस लेते हुए कभी भी नहीं भूलता। हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा ने गुरू की संगति में मिला दिया, उसे वह परमात्मा हर जगह मौजूद दिखाई देने लग जाता है। पर, हे भाई! जिनके अंदर परमात्मा का प्यार पैदा नहीं होता, वह सदा चिंतातुर हो-हो के आत्मिक मौत मरता रहता है।८। हे भाई! (शरण में आए मनुष्य को) अपने पल्लू से लगा के परमात्मा खुद इस दुख-रूपी संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। प्रभू (उस पर) कृपा करके (उसको) मेहर की निगाह से देखता है, उसका बेअंत पक्ष करता है। हे भाई! मनुष्य का मन ठंडा हो जाता है, शरीर शांत हो जाता है, वह (अपने आत्मिक जीवन के लिए) नाम की खुराक़ (खाता है), नाम का सहारा लेता है। हे नानक! (कह–) हे भाई! उस परमात्मा की शरण पड़ो, जो सारे पाप काट सकता है।९।१।

ਅੰਗ : 639
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧ ਅਸਟਪਦੀਆ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਸਭੁ ਜਗੁ ਜਿਨਹਿ ਉਪਾਇਆ ਭਾਈ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ॥ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਜਿਨਿ ਸਾਜਿਆ ਭਾਈ ਦੇ ਕਰਿ ਅਪਣੀ ਵਥੁ ॥ ਕਿਨਿ ਕਹੀਐ ਕਿਉ ਦੇਖੀਐ ਭਾਈ ਕਰਤਾ ਏਕੁ ਅਕਥੁ ॥ ਗੁਰੁ ਗੋਵਿੰਦੁ ਸਲਾਹੀਐ ਭਾਈ ਜਿਸ ਤੇ ਜਾਪੈ ਤਥੁ ॥੧॥ ਮੇਰੇ ਮਨ ਜਪੀਐ ਹਰਿ ਭਗਵੰਤਾ ॥ ਨਾਮੁ ਦਾਨੁ ਦੇਇ ਜਨ ਅਪਨੇ ਦੂਖ ਦਰਦਾ ਕਾ ਹੰਤਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਜਾ ਕੈ ਘਰਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੈ ਭਾਈ ਨਉ ਨਿਧਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥ ਤਿਸ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨਾ ਪਵੈ ਭਾਈ ਊਚਾ ਅਗਮ ਅਪਾਰ ॥ ਜੀਅ ਜੰਤ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਦਾ ਭਾਈ ਨਿਤ ਨਿਤ ਕਰਦਾ ਸਾਰ ॥ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟੀਐ ਭਾਈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਣਹਾਰ ॥੨॥ ਸਚੇ ਚਰਣ ਸਰੇਵੀਅਹਿ ਭਾਈ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਹੋਵੈ ਨਾਸੁ ॥ ਮਿਲਿ ਸੰਤ ਸਭਾ ਮਨੁ ਮਾਂਜੀਐ ਭਾਈ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਮਿ ਨਿਵਾਸੁ ॥ ਮਿਟੈ ਅੰਧੇਰਾ ਅਗਿਆਨਤਾ ਭਾਈ ਕਮਲ ਹੋਵੈ ਪਰਗਾਸੁ ॥ ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਭਾਈ ਸਭਿ ਫਲ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥੩॥ ਮੇਰਾ ਤੇਰਾ ਛੋਡਿਐ ਭਾਈ ਹੋਈਐ ਸਭ ਕੀ ਧੂਰਿ ॥ ਘਟਿ ਘਟਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਸਾਰਿਆ ਭਾਈ ਪੇਖੈ ਸੁਣੈ ਹਜੂਰਿ ॥ ਜਿਤੁ ਦਿਨਿ ਵਿਸਰੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਭਾਈ ਤਿਤੁ ਦਿਨਿ ਮਰੀਐ ਝੂਰਿ ॥ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਮਰਥੋ ਭਾਈ ਸਰਬ ਕਲਾ ਭਰਪੂਰਿ ॥੪॥ ਪ੍ਰੇਮ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਮੁ ਹੈ ਭਾਈ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਬਿਨਾਸੁ ॥ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਮੇਲਿ ਲਏ ਭਾਈ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮ ਨਿਵਾਸੁ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਮਲੁ ਪ੍ਰਗਾਸੀਐ ਭਾਈ ਰਿਦੈ ਹੋਵੈ ਪਰਗਾਸੁ ॥ ਪ੍ਰਗਟੁ ਭਇਆ ਪਰਤਾਪੁ ਪ੍ਰਭ ਭਾਈ ਮਉਲਿਆ ਧਰਤਿ ਅਕਾਸੁ ॥੫॥ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸੰਤੋਖਿਆ ਭਾਈ ਅਹਿਨਿਸਿ ਲਾਗਾ ਭਾਉ ॥ ਰਸਨਾ ਰਾਮੁ ਰਵੈ ਸਦਾ ਭਾਈ ਸਾਚਾ ਸਾਦੁ ਸੁਆਉ ॥ ਕਰਨੀ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਜੀਵਿਆ ਭਾਈ ਨਿਹਚਲੁ ਪਾਇਆ ਥਾਉ ॥ ਜਿਸੁ ਪਰਤੀਤਿ ਨ ਆਵਈ ਭਾਈ ਸੋ ਜੀਅੜਾ ਜਲਿ ਜਾਉ ॥੬॥ ਬਹੁ ਗੁਣ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬੈ ਭਾਈ ਹਉ ਤਿਸ ਕੈ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥ ਓਹੁ ਨਿਰਗੁਣੀਆਰੇ ਪਾਲਦਾ ਭਾਈ ਦੇਇ ਨਿਥਾਵੇ ਥਾਉ ॥ ਰਿਜਕੁ ਸੰਬਾਹੇ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਭਾਈ ਗੂੜਾ ਜਾ ਕਾ ਨਾਉ ॥ ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਸਾਚਾ ਭੇਟੀਐ ਭਾਈ ਪੂਰਾ ਤਿਸੁ ਕਰਮਾਉ ॥੭॥ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਘੜੀ ਨ ਜੀਵੀਐ ਭਾਈ ਸਰਬ ਕਲਾ ਭਰਪੂਰਿ ॥ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਨ ਵਿਸਰੈ ਭਾਈ ਪੇਖਉ ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ॥ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਮਿਲਾਇਆ ਭਾਈ ਸਰਬ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥ ਜਿਨਾ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਲਗੀਆ ਭਾਈ ਸੇ ਨਿਤ ਨਿਤ ਮਰਦੇ ਝੂਰਿ ॥੮॥ ਅੰਚਲਿ ਲਾਇ ਤਰਾਇਆ ਭਾਈ ਭਉਜਲੁ ਦੁਖੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿਆ ਭਾਈ ਕੀਤੋਨੁ ਅੰਗੁ ਅਪਾਰੁ ॥ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਇਆ ਭਾਈ ਭੋਜਨੁ ਨਾਮ ਅਧਾਰੁ ॥ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਸਰਣਾਗਤੀ ਭਾਈ ਜਿ ਕਿਲਬਿਖ ਕਾਟਣਹਾਰੁ ॥੯॥੧॥

ਅਰਥ: ਰਾਗ ਸੋਰਠਿ, ਘਰ ੧ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨਦੇਵ ਜੀ ਦੀ ਅੱਠ-ਬੰਦਾਂ ਵਾਲੀ ਬਾਣੀ। ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਇੱਕ ਹੈ ਅਤੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਆਪ ਹੀ ਸਾਰਾ ਜਗਤ ਪੈਦਾ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਜੋ ਸਾਰੇ ਜਗਤ ਦਾ ਮੂਲ ਹੈ, ਜੋ ਸਾਰੀਆਂ ਤਾਕਤਾਂ ਦਾ ਮਾਲਕ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੇ ਆਪਣੀ ਸੱਤਿਆ ਦੇ ਕੇ (ਮਨੁੱਖ ਦਾ) ਜਿੰਦ ਤੇ ਸਰੀਰ ਪੈਦਾ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਉਹ ਕਰਤਾਰ (ਤਾਂ) ਕਿਸੇ ਪਾਸੋਂ ਭੀ ਬਿਆਨ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ। ਹੇ ਭਾਈ! ਉਹ ਕਰਤਾਰ ਦਾ ਸਰੂਪ ਦਸਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ। ਉਸ ਨੂੰ ਕਿਵੇਂ ਵੇਖਿਆ ਜਾਏ ? ਹੇ ਭਾਈ! ਗੋਬਿੰਦ ਦੇ ਰੂਪ ਗੁਰੂ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤਿ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਗੁਰੂ ਪਾਸੋਂ ਹੀ ਸਾਰੇ ਜਗਤ ਦੇ ਮੂਲ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਸੂਝ ਪੈ ਸਕਦੀ ਹੈ ॥੧॥ ਹੇ ਮੇਰੇ ਮਨ! (ਸਦਾ) ਹਰੀ ਭਗਵਾਨ ਦਾ ਨਾਮ ਜਪਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਭਗਵਾਨ ਆਪਣੇ ਸੇਵਕ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਨਾਮ ਦੀ ਦਾਤਿ ਦੇਂਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਸਾਰੇ ਦੁੱਖਾਂ ਪੀੜਾਂ ਦਾ ਨਾਸ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਹੈ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਘਰ ਵਿਚ ਹਰੇਕ ਚੀਜ਼ ਮੌਜੂਦ ਹੈ, ਜਿਸ ਦੇ ਘਰ ਵਿਚ ਜਗਤ ਦੇ ਸਾਰੇ ਨੌ ਹੀ ਖ਼ਜ਼ਾਨੇ ਮੌਜੂਦ ਹਨ, ਜਿਸ* *ਦੇ ਘਰ ਵਿਚ ਭੰਡਾਰੇ ਭਰੇ ਪਏ ਹਨ, ਉਸ ਦਾ ਮੁੱਲ ਨਹੀਂ ਪੈ ਸਕਦਾ, ਉਹ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਹੈ, ਉਹ ਅਪਹੁੰਚ ਹੈ, ਉਹ ਬੇਅੰਤ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਦੀ ਪਾਲਣਾ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਸਦਾ ਹੀ (ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦੀ) ਸੰਭਾਲ ਕਰਦਾ ਹੈ। (ਉਸ ਦਾ ਦਰਸਨ ਕਰਨ ਲਈ) ਹੇ ਭਾਈ! ਪੂਰੇ ਗੁਰੂ ਨੂੰ ਮਿਲਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, (ਗੁਰੂ ਹੀ ਆਪਣੇ) ਸ਼ਬਦ ਵਿਚ ਜੋੜ ਕੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ ਮਿਲਾ ਸਕਣ ਵਾਲਾ ਹੈ ॥੨॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਸਦਾ-ਥਿਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਚਰਨ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਵਸਾਈ ਰੱਖਣੇ ਚਾਹੀਦੇ ਹਨ, (ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਨ ਦੀ) ਭਟਕਣਾ ਦਾ, (ਹਰੇਕ ਕਿਸਮ ਦੇ) ਡਰ ਦਾ ਨਾਸ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ ਮਿਲ ਕੇ ਮਨ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ (ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਵਿਚ (ਮਨ ਦਾ) ਨਿਵਾਸ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। (ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ) ਹੇ ਭਾਈ! ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਵਲੋਂ ਬੇ-ਸਮਝੀ ਦਾ ਹਨੇਰਾ (ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਅੰਦਰੋਂ) ਮਿਟ ਜਾਂਦਾ ਹੈ (ਹਿਰਦੇ ਦੇ) ਕੌਲ-ਫੁੱਲ ਦਾ ਖਿੜਾਉ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਗੁਰੂ ਦੇ ਬਚਨਾਂ ਉੱਤੇ ਤੁਰਿਆਂ ਆਤਮਕ ਆਨੰਦ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਸਾਰੇ ਫਲ ਗੁਰੂ ਦੇ ਕੋਲ ਹਨ ॥੩॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਵਿਤਕਰਾ ਛੱਡ ਦੇਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਸਭਨਾਂ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਦੀ ਧੂੜ ਬਣ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਹਰੇਕ ਸਰੀਰ ਵਿਚ ਵੱਸ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਹ ਸਭ ਦੇ ਅੰਗ-ਸੰਗ ਹੋ ਕੇ (ਸਭ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਨੂੰ) ਵੇਖਦਾ ਹੈ (ਸਭਨਾਂ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ) ਸੁਣਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਦਿਨ ਪਰਮਾਤਮਾ ਭੁੱਲ ਜਾਏ, ਉਸ ਦਿਨ ਦੁੱਖੀ ਹੋ ਹੋ ਕੇ ਆਤਮਕ ਮੌਤ ਸਹੇੜ ਲਈਦੀ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! (ਇਹ ਯਾਦ ਰੱਖੋ ਕਿ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਸਭ ਕੁਝ ਕਰ ਸਕਣ ਵਾਲਾ ਅਤੇ (ਜੀਵਾਂ ਪਾਸੋਂ) ਕਰਾ ਸਕਣ ਵਾਲਾ ਹੈ। ਪਰਮਾਤਮਾ ਵਿਚ ਸਾਰੀਆਂ ਤਾਕਤਾਂ ਮੌਜੂਦ ਹਨ ॥੪॥ ਹੇ ਭਾਈ! (ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ) ਪਿਆਰ ਦਾ ਕੀਮਤੀ ਧਨ ਮੌਜੂਦ ਹੈ, ਹਰਿ-ਨਾਮ ਮੌਜੂਦ ਹੈ (ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰੋਂ) ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਦਾ ਨਾਸ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ (ਜਦੋਂ) ਚੰਗਾ ਲੱਗੇ ਤਦੋਂ ਉਹ (ਜਿਸ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ) ਮਿਲਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ (ਉਸ ਦੇ) ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਉਸ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਨਿਵਾਸ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਗੁਰੂ ਦੇ ਸਨਮੁਖ ਹੋਇਆਂ (ਹਿਰਦੇ ਦਾ) ਕੌਲ-ਫੁੱਲ ਖਿੜ ਪੈਂਦਾ ਹੈ, ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ (ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੀ ਸੋਝੀ ਦਾ) ਚਾਨਣ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! (ਗੁਰੂ ਦੀ ਸਰਨ ਪਿਆਂ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਅੰਦਰ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਤਾਕਤ ਪਰਗਟ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ (ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਸਮਝ ਆ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਕਿ ਪਰਮਾਤਮਾ ਬੇਅੰਤ ਤਾਕਤ ਦਾ ਮਾਲਕ ਹੈ, ਅਤੇ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਤਾਕਤ ਨਾਲ ਹੀ) ਧਰਤੀ ਖਿੜੀ ਹੋਈ ਹੈ, ਆਕਾਸ਼ ਖਿੜਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ ॥੫॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਪੂਰੇ ਗੁਰੂ ਨੇ ਸੰਤੋਖ ਦੀ ਦਾਤਿ ਦੇ ਦਿੱਤੀ, (ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰ) ਦਿਨ ਰਾਤ (ਪ੍ਰਭੂ-ਚਰਨਾਂ ਦਾ) ਪਿਆਰ ਬਣਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਸਦਾ (ਆਪਣੀ) ਜੀਭ ਨਾਲ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਜਪਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। (ਨਾਮ ਜਪਣ ਦਾ ਇਹ) ਸੁਆਦ (ਇਹ) ਨਿਸ਼ਾਨਾ (ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰ) ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਆਪਣੇ ਕੰਨਾਂ ਨਾਲ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ) ਸੁਣ ਸੁਣ ਕੇ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਹਾਸਲ ਕਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ-ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ) ਅਟੱਲ ਥਾਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰੀ ਰੱਖਦਾ ਹੈ। ਪਰ, ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ (ਗੁਰੂ ਉਤੇ) ਇਤਬਾਰ ਨਹੀਂ ਬੱਝਦਾ ਉਸ ਦੀ (ਨਿਭਾਗੀ) ਜਿੰਦ (ਵਿਕਾਰਾਂ ਵਿਚ) ਸੜ ਜਾਂਦੀ ਹੈ (ਆਤਮਕ ਮੌਤ ਸਹੇੜ ਲੈਂਦੀ ਹੈ) ॥੬॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਮੇਰੇ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਵਿਚ ਬੇਅੰਤ ਗੁਣ ਹਨ, ਮੈਂ ਉਸ ਤੋਂ ਸਦਕੇ-ਕੁਰਬਾਨ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ। ਹੇ ਭਾਈ! ਉਹ ਮਾਲਕ ਗੁਣ-ਹੀਨ ਨੂੰ (ਭੀ) ਪਾਲਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਨਿਆਸਰੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਸਹਾਰਾ ਦੇਂਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਮਾਲਕ ਹਰੇਕ ਸਾਹ ਦੇ ਨਾਲ ਰਿਜ਼ਕ ਅਪੜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦਾ ਨਾਮ (ਸਿਮਰਨ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਦੇ ਮਨ ਉੱਤੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ) ਗੂੜ੍ਹਾ ਰੰਗ ਚਾੜ੍ਹ ਦੇਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਸੱਚਾ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪੈਂਦਾ ਹੈ (ਉਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭੂ ਮਿਲ ਪੈਂਦਾ ਹੈ) ਉਸ ਦੀ ਕਿਸਮਤ ਜਾਗ ਪੈਂਦੀ ਹੈ ॥੭॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ ਸਾਰੀਆਂ ਤਾਕਤਾਂ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਹੈ, ਉਸ (ਦੀ ਯਾਦ) ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਇਕ ਘੜੀ ਭਰ ਭੀ (ਮਨੁੱਖ ਦਾ) ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਕਾਇਮ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਸਕਦਾ। ਹੇ ਭਾਈ! ਮੈਂ ਤਾਂ ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਅੰਗ ਸੰਗ ਵੱਸਦਾ ਵੇਖਦਾ ਹਾਂ, ਮੈਨੂੰ ਉਹ ਖਾਂਦਿਆਂ ਸਾਹ ਲੈਂਦਿਆਂ ਕਦੇ ਭੀ ਨਹੀਂ ਭੁੱਲਦਾ। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਗੁਰੂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ ਮਿਲਾ ਦਿੱਤਾ, ਉਸ ਨੂੰ ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ ਸਭ ਥਾਂ ਮੌਜੂਦ ਦਿੱਸਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਪਰ, ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਪਿਆਰ ਪੈਦਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਉਹ ਸਦਾ ਚਿੰਤਾਤੁਰ ਹੋ ਹੋ ਕੇ ਆਤਮਕ ਮੌਤ ਸਹੇੜਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ ॥੮॥ ਹੇ ਭਾਈ! (ਸਰਨ ਪਏ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ) ਆਪਣੇ ਪੱਲੇ ਲਾ ਕੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਆਪ ਇਸ ਦੁੱਖ-ਰੂਪ ਸੰਸਾਰ-ਸਮੁੰਦਰ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਪਭੂ (ਉਸ ਉਤੇ) ਕਿਰਪਾ ਕਰ ਕੇ (ਉਸ ਨੂੰ) ਮੇਹਰ ਦੀ ਨਿਗਾਹ ਨਾਲ ਵੇਖਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦਾ ਬੇਅੰਤ ਪੱਖ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਉਸ ਮਨੁੱਖ ਦਾ ਮਨ ਠੰਢਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਸਰੀਰ ਸ਼ਾਂਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ (ਆਪਣੇ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਵਾਸਤੇ) ਨਾਮ ਦੀ ਖ਼ੁਰਾਕ (ਖਾਂਦਾ ਹੈ), ਨਾਮ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! (ਆਖੋ-) ਹੇ ਭਾਈ! ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਸਰਨ ਪਵੋ, ਜੋ ਸਾਰੇ ਪਾਪ ਕੱਟ ਸਕਦਾ ਹੈ ॥੯॥੧॥

ਅੰਗ : 633
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੯ ॥ ਇਹ ਜਗਿ ਮੀਤੁ ਨ ਦੇਖਿਓ ਕੋਈ ॥ ਸਗਲ ਜਗਤੁ ਅਪਨੈ ਸੁਖਿ ਲਾਗਿਓ ਦੁਖ ਮੈ ਸੰਗਿ ਨ ਹੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ ਦਾਰਾ ਮੀਤ ਪੂਤ ਸਨਬੰਧੀ ਸਗਰੇ ਧਨ ਸਿਉ ਲਾਗੇ ॥ ਜਬ ਹੀ ਨਿਰਧਨ ਦੇਖਿਓ ਨਰ ਕਉ ਸੰਗੁ ਛਾਡਿ ਸਭ ਭਾਗੇ ॥੧॥ ਕਹਂਉ ਕਹਾ ਯਿਆ ਮਨ ਬਉਰੇ ਕਉ ਇਨ ਸਿਉ ਨੇਹੁ ਲਗਾਇਓ ॥ ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਸਕਲ ਭੈ ਭੰਜਨ ਜਸੁ ਤਾ ਕੋ ਬਿਸਰਾਇਓ ॥੨॥ ਸੁਆਨ ਪੂਛ ਜਿਉ ਭਇਓ ਨ ਸੂਧਉ ਬਹੁਤੁ ਜਤਨੁ ਮੈ ਕੀਨਉ ॥ ਨਾਨਕ ਲਾਜ ਬਿਰਦ ਕੀ ਰਾਖਹੁ ਨਾਮੁ ਤੁਹਾਰਉ ਲੀਨਉ ॥੩॥੯॥
ਅਰਥ: ਹੇ ਭਾਈ! ਇਸ ਜਗਤ ਵਿਚ ਕੋਈ (ਤੋੜ ਸਾਥ ਨਿਬਾਹੁਣ ਵਾਲਾ) ਮਿੱਤਰ (ਮੈਂ) ਨਹੀਂ ਵੇਖਿਆ। ਸਾਰਾ ਸੰਸਾਰ ਆਪਣੇ ਸੁਖ ਵਿਚ ਹੀ ਜੁੱਟਾ ਪਿਆ ਹੈ। ਦੁੱਖ ਵਿਚ (ਕੋਈ ਕਿਸੇ ਦੇ) ਨਾਲ (ਸਾਥੀ) ਨਹੀਂ ਬਣਦਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਇਸਤ੍ਰੀ, ਮਿੱਤਰ, ਪੁੱਤਰ, ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰ-ਇਹ ਸਾਰੇ ਧਨ ਨਾਲ (ਹੀ) ਪਿਆਰ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਜਦੋਂ ਹੀ ਇਹਨਾਂ ਨੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਕੰਗਾਲ ਵੇਖਿਆ, (ਤਦੋਂ) ਸਾਥ ਛੱਡ ਕੇ ਨੱਸ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ॥੧॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਮੈਂ ਇਸ ਝੱਲੇ ਮਨ ਨੂੰ ਕੀਹ ਸਮਝਾਵਾਂ ? (ਇਸ ਨੇ) ਇਹਨਾਂ (ਕੱਚੇ ਸਾਥੀਆਂ) ਨਾਲ ਪਿਆਰ ਪਾਇਆ ਹੋਇਆ ਹੈ। (ਜੇਹੜਾ ਪਰਮਾਤਮਾ) ਗਰੀਬਾਂ ਦਾ ਰਾਖਾ ਤੇ ਸਾਰੇ ਡਰ ਨਾਸ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਹੈ ਉਸ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ (ਇਸ ਨੇ) ਭੁਲਾਈ ਹੋਈ ਹੈ ॥੨॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਵੇਂ ਕੁੱਤੇ ਦੀ ਪੂਛਲ ਸਿੱਧੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ (ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਸ ਮਨ ਦੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਯਾਦ ਵਲੋਂ ਲਾ-ਪਰਵਾਹੀ ਹਟਦੀ ਨਹੀਂ) ਮੈਂ ਬਹੁਤ ਜਤਨ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! (ਆਖੋ – ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਆਪਣੇ) ਮੁੱਢ-ਕਦੀਮਾਂ ਦੇ (ਪਿਆਰ ਵਾਲੇ) ਸੁਭਾਵ ਦੀ ਲਾਜ ਰੱਖ (ਮੇਰੀ ਮਦਦ ਕਰ, ਤਾਂ ਹੀ) ਮੈਂ ਤੇਰਾ ਨਾਮ ਜਪ ਸਕਦਾ ਹਾਂ ॥੩॥੯॥

अंग : 633
सोरठि महला ९ ॥ इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥ सगल जगतु अपनै सुखि लागिओ दुख मै संगि न होई ॥१॥ रहाउ ॥ दारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ लागे ॥ जब ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे ॥१॥ कहंउ कहा यिआ मन बउरे कउ इन सिउ नेहु लगाइओ ॥ दीना नाथ सकल भै भंजन जसु ता को बिसराइओ ॥२॥ सुआन पूछ जिउ भइओ न सूधउ बहुतु जतनु मै कीनउ ॥ नानक लाज बिरद की राखहु नामु तुहारउ लीनउ ॥३॥९॥
अर्थ: हे भाई! इस जगत में कोई (अंत तक साथ निभाने वाला) मित्र (मैंने) नहीं देखा। सारा संसार अपने सुख में ही लगा हुआ है। दुख में (कोई किसी के) साथ (साथी) नहीं बनता ॥१॥ रहाउ ॥ हे भाई! स्त्री, मित्र, पुत्र, रिश्तेदार-यह सारे धन के साथ (ही) प्यार करते हैं। जब ही इन्होंने मनुष्य को कंगाल देखा, (तभी) साथ छोड़ कर भाग जाते हैं ॥१॥ हे भाई! मैं इस पागल मन को क्या समझाऊं ? (इस ने) इन (कच्चे साथियों) के साथ प्यार पाया हुआ है। (जो परमात्मा) गरीबों का रक्षक और सभी डर नाश करने वाला है उस की सिफ़त-सलाह (इस ने) भुलाई हुई है ॥२॥ हे भाई! जैसे कुत्ते की पूंछ सीधी नहीं होती (इसी तरह इस मन की परमात्मा की याद से लापरवाही हटती नहीं) मैंने बहुत यत्न किया है। हे नानक जी! (कहो – हे प्रभू! अपने) मुढ़-कदीमा के (प्यार वाले) स्वभाव की लाज रखो (मेरी मदद करो, तो ही) मैं आपका नाम जप सकता हूँ ॥३॥९॥

ਅੰਗ : 619
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥ ਹਮਰੀ ਗਣਤ ਨ ਗਣੀਆ ਕਾਈ ਅਪਣਾ ਬਿਰਦੁ ਪਛਾਣਿ ॥ ਹਾਥ ਦੇਇ ਰਾਖੇ ਕਰਿ ਅਪੁਨੇ ਸਦਾ ਸਦਾ ਰੰਗੁ ਮਾਣਿ ॥੧॥ ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਦ ਮਿਹਰਵਾਣ ॥ ਬੰਧੁ ਪਾਇਆ ਮੇਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹੋਈ ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਜੀਉ ਪਾਇ ਪਿੰਡੁ ਜਿਨਿ ਸਾਜਿਆ ਦਿਤਾ ਪੈਨਣੁ ਖਾਣੁ ॥ ਅਪਣੇ ਦਾਸ ਕੀ ਆਪਿ ਪੈਜ ਰਾਖੀ ਨਾਨਕ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥੨॥੧੬॥੪੪॥
ਅਰਥ: ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਅਸਾਂ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਕੀਤੇ ਮੰਦ-ਕਰਮਾਂ ਦਾ ਕੋਈ ਖ਼ਿਆਲ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ। ਉਹ ਆਪਣੇ ਮੁੱਢ-ਕਦੀਮਾਂ ਦੇ (ਪਿਆਰ ਵਾਲੇ) ਸੁਭਾਉ ਨੂੰ ਚੇਤੇ ਰੱਖਦਾ ਹੈ, (ਉਹ, ਸਗੋਂ, ਸਾਨੂੰ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾ ਕੇ, ਸਾਨੂੰ) ਆਪਣੇ ਬਣਾ ਕੇ (ਆਪਣੇ) ਹੱਥ ਦੇ ਕੇ (ਸਾਨੂੰ ਵਿਕਾਰਾਂ ਵਲੋਂ) ਬਚਾਂਦਾ ਹੈ। (ਜਿਸ ਵਡ-ਭਾਗੀ ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ) ਸਦਾ ਹੀ ਆਤਮਕ ਆਨੰਦ ਮਾਣਦਾ ਹੈ ॥੧॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਸਦਾ ਦਇਆਵਾਨ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, (ਕੁਕਰਮਾਂ ਵਲ ਪਰਤ ਰਹੇ ਬੰਦਿਆਂ ਨੂੰ ਉਹ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਂਦਾ ਹੈ। ਜਿਸ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪਿਆ, ਉਸ ਦੇ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦੇ ਰਸਤੇ ਵਿਚ) ਮੇਰੇ ਪੂਰੇ ਗੁਰੂ ਨੇ ਬੰਨ੍ਹ ਮਾਰ ਦਿੱਤਾ (ਤੇ, ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰ) ਸਾਰੇ ਆਤਮਕ ਆਨੰਦ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਏ ॥ ਰਹਾਉ॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਜਿੰਦ ਪਾ ਕੇ (ਸਾਡਾ) ਸਰੀਰ ਪੈਦਾ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਜੇਹੜਾ (ਹਰ ਵੇਲੇ) ਸਾਨੂੰ ਖ਼ੁਰਾਕ ਤੇ ਪੁਸ਼ਾਕ ਦੇ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ (ਸੰਸਾਰ-ਸਮੁੰਦਰ ਦੀਆਂ ਵਿਕਾਰ-ਲਹਿਰਾਂ ਤੋਂ) ਆਪਣੇ ਸੇਵਕ ਦੀ ਇੱਜ਼ਤ (ਗੁਰੂ ਮਿਲਾ ਕੇ) ਆਪ ਬਚਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ! (ਆਖ ਕਿ ਮੈਂ ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਤੋਂ) ਸਦਾ ਸਦਕੇ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ ॥੨॥੧੬॥੪੪॥

अंग : 619
सोरठि महला ५ ॥ हमरी गणत न गणीआ काई अपणा बिरदु पछाणि ॥ हाथ देइ राखे करि अपुने सदा सदा रंगु माणि ॥१॥ साचा साहिबु सद मिहरवाण ॥ बंधु पाइआ मेरै सतिगुरि पूरै होई सरब कलिआण ॥ रहाउ ॥ जीउ पाइ पिंडु जिनि साजिआ दिता पैनणु खाणु ॥ अपणे दास की आपि पैज राखी नानक सद कुरबाणु ॥२॥१६॥४४॥
अर्थ: हे भाई! परमात्मा हम जीवों के किये बुरे-कर्मो का कोई ध्यान नहीं करता। वह अपने मूढ़-कदीमा के (प्यार वाले) सवभाव को याद रखता है, (वह, बल्कि, हमें गुरु मिला कर, हमें) अपना बना कर (अपने) हाथ दे के (हमे विकारों से) बचाता है। (जिस बड़े-भाग्य वाले को गुरु मिल जाता है , वह) सदा ही आत्मिक आनंद मानता रहता है॥१॥ हे भाई! सदा कायम रहने वाला मालिक-प्रभु सदा दयावान रहता है, (कुकर्मो की तरफ बड़ रहे मनुख को गुरु मिलाता है। जिस को पूरा गुरु मिल गया, उस के विकारों के रास्ते में) मेरे पूरे गुरु ने बंद लगा दिया ( और, इस प्रकार उस के अंदर) सारे आत्मिक आनंद पैदा हो गए॥रहाउ॥ हे भाई! जिस परमात्मा ने जान डालकर (हमारा) सरीर पैदा किया है, जो (हर समय) हमे खुराक और पोशाक दे रहा है, वह परमात्मा (संसार-समुन्द्र की विकार लहरों से) अपने सेवक की इज्ज़त (गुरु मिला कर) आप बचाता है। हे नानक! (कह की मैं उस परमात्मा से) सदा सदके जाता हूँ॥२॥१६॥४४॥

ਦੀਨ ਦੁਨੀ ਦੇ ਮਾਲਿਕ ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਪੁਰਬ ਦੀਆਂ ਸਰਬੱਤ ਸੰਗਤਾਂ ਨੂੰ ਲੱਖ ਲੱਖ ਮੁਬਾਰਕਾਂ ਹੋਵਣ ਜੀ ।
ਅਸੀ ਸਾਰੇ ਗੁਰੂ ਅੱਗੇ ਇਕ ਅਰਦਾਸ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਹੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਜੀ ਸਾਨੂੰ ਆਪਣੇ ਗੁਰਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਦੀ ਧੂੜ ਬਖਸ਼ਿਸ਼ ਕਰੋ ਜੀ । ਅਸੀ ਪੂਰਨ ਗੁਰਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਦੀ ਧੂੜ ਨੂੰ ਵੀ ਤਰਸਦੇ ਹਾਂ ਹੋ ਸਕਦਾ ਕਿਧਰੇ ਸਾਨੂੰ ਐਸਾ ਗੁਰਸਿੱਖ ਮਿਲ ਜਾਵੇ ਜਿਹੜਾ ਗੁਰੂ ਦੇ ਦਰ ਤੇ ਪਰਵਾਨ ਹੋਵੇ । ਉਸ ਗੁਰਸਿੱਖ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰਕੇ ਸਾਡਾ ਵੀ ਜੀਵਨ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸਾਏ ਰਾਹ ਤੇ ਚੱਲ ਪਵੇ। ਪਰ ਸੋਚੋ ਜੇ ਪੂਰਾ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਕਹਿ ਦੇਵੇ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਅੱਜ ਤੋ ਤੁਸੀ ਸਾਡੇ ਸਰੀਰ ਦਾ ਹੀ ਅੰਗ ਬਣ ਗਏ ਜੇ ਤੁਹਾਡੇ ਵਿੱਚ ਤੇ ਸਾਡੇ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਭੇਦ ਨਹੀ ਰਿਹਾ । ਸੋਚੋ ਉਸ ਸਮੇ ਦਾ ਵਿਖਿਆਣ ਕੋਈ ਵੇਦ ਜਾ ਗ੍ਰੰਥ ਕੀ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ । ਪਰ ਭਾਈ ਲਹਿਣੇ ਤੋ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਤਕ ਦਾ ਸਫਰ ਕੋਈ ਸੋਖਾ ਨਹੀ ਸੀ ਜਿਹੜੀ ਸੇਵਾ , ਸਿਦਕ , ਨਿਮਰਤਾ ਤੇ ਆਗਿਆਕਾਰ ਦੀ ਮੂਰਤ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਮਹਾਰਾਜ ਨੇ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੀ ਕੋਈ ਨਹੀ ਕਰ ਸਕਦਾ । ਜੇ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਕਹਿ ਦਿੱਤਾ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਇਸ ਚਿੱਕੜ ਵਿੱਚ ਲੋਟਾ ਡਿਗ ਪਿਆ ਕੱਢ ਲਿਆਉ । ਕਿਸੇ ਵੱਲ ਨਹੀ ਤੱਕਿਆ ਲੋਕ ਕੀ ਕਹਿਣਗੇ ਜਾ ਕੱਪੜੇ ਗੰਦੇ ਹੋ ਜਾਣਗੇ ਬੱਸ ਹੁਕਮ ਵੱਲ ਦੇਖਿਆ ਜੋ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਛਾਲ ਮਾਰ ਕੇ ਚਿੱਕੜ ਵਿਚੋ ਲੋਟਾ ਕੱਢ ਲਿਆਦਾ । ਜੇ ਨਵੇ ਕੱਪੜੇ ਪਹਿਣ ਕੇ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਆਏ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਗਿਲੇ ਕੱਖ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਦੇ ਸੀਸ ਤੇ ਚੁਕਾ ਦਿੱਤੇ । ਨਵੇ ਕੱਪੜਿਆਂ ਤੇ ਗੰਦੇ ਛਿੱਟੇ ਪੈ ਕੇ ਕੱਪੜੇ ਖਰਾਬ ਹੋ ਗਏ ਜਦੋ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਘਰ ਆਏ ਮਾਤਾ ਸੁਲੱਖਣੀ ਜੀ ਨੇ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੂੰ ਆਖਿਆ ਤੁਸੀ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਦੇ ਨਵੇ ਕੱਪੜੇ ਚਿਕੜ ਨਾਲ ਖਰਾਬ ਕਰਵਾ ਦਿੱਤੇ । ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਹੱਸ ਕੇ ਆਖਿਆ ਇਹ ਚਿਕੜ ਨਹੀ ਕੇਸਰ ਦਾ ਛਿੜਕਾ ਕੀਤਾ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਦੇ ਉਤੇ । ਏਨੀ ਔਖੀ ਸੇਵਾ ਤੇ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਸੁਭਾਅ ਤੇ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਹੀ ਪੂਰੇ ਉਤਰ ਸਕਦੇ ਸਨ ਹੋਰ ਕੋਈ ਨਹੀ । ਨਾ ਗੁਰੂ ਪੁੱਤਰ ਤੇ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ ਸੇਵਾਦਾਰ ਉਹਨਾ ਵਾਂਗ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦਾ ਹੁਕਮ ਮੰਨ ਸਕਦਾ ਸੀ । ਜਦੋ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਨਾਲ ਭਾਈ ਲਹਿਣਾ ਜੀ ਨੇ ਤੁਰਨਾ ਇਹ ਵੀ ਖਿਆਲ ਰੱਖਣਾ ਮੇਰੀ ਤੇ ਗੱਲ ਦੂਰ ਦੀ ਕਿਤੇ ਮੇਰੀ ਬਾਂਹ ਵੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਤੋ ਅੱਗੇ ਨਾ ਹੋ ਜਾਵੇ । ਏਵੇ ਨਹੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦਾ ਰੂਪ ਹੋ ਕੇ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਸਰੀਰ ਦਾ ਅੰਗ ਬਣ ਕੇ ਗੁਰਗੱਦੀ ਤੇ ਬੈਠ ਕੇ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਬਣ ਗਏ। ਹੋਰ ਵੀ ਮਹਾਨ ਕੌਤਕ ਤੇ ਸੇਵਾ ਦਾ ਸਿਖਰ ਜੋ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ ਜੇ ਪੂਰਾ ਲਿਖਾ ਹੋ ਸਕਦਾ ਕਈ ਜਨਮਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਪੂਰੇ ਨਾ ਲਿਖ ਪਾਵਾਂ । ਗੁਰੂ ਦੀ ਜੀਵਨੀ ਸਾਡੇ ਵਰਗੇ ਅਧੂਰੇ ਕੀ ਲਿਖ ਸਕਦੇ ਹਨ ਬਸ ਮੈ ਏਨਾ ਹੀ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਉਹਨਾ ਵਰਗੇ ਉਹੋ ਹੀ ਸਨ ਐਸੇ ਦੀਨ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਮਾਲਿਕ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਪੁਰਬ ਦੀਆਂ ਫੇਰ ਸੰਗਤਾਂ ਨੂੰ ਲੱਖ ਲੱਖ ਮੁਬਾਰਕਾਂ ਹੋਵਣ ਜੀ ।
ਜੋਰਾਵਰ ਸਿੰਘ ਤਰਸਿੱਕਾ ।

ਅੰਗ : 597
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੧ ॥ ਤੂ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤਾ ਦਾਨਿ ਮਤਿ ਪੂਰਾ ਹਮ ਥਾਰੇ ਭੇਖਾਰੀ ਜੀਉ ॥ ਮੈ ਕਿਆ ਮਾਗਉ ਕਿਛੁ ਥਿਰੁ ਨ ਰਹਾਈ ਹਰਿ ਦੀਜੈ ਨਾਮੁ ਪਿਆਰੀ ਜੀਉ ॥੧॥ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਬਨਵਾਰੀ ॥ ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਗੁਪਤੋ ਵਰਤੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਰੀ ਜੀਉ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਮਰਤ ਪਇਆਲ ਅਕਾਸੁ ਦਿਖਾਇਓ ਗੁਰਿ ਸਤਿਗੁਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ਜੀਉ ॥ ਸੋ ਬ੍ਰਹਮੁ ਅਜੋਨੀ ਹੈ ਭੀ ਹੋਨੀ ਘਟ ਭੀਤਰਿ ਦੇਖੁ ਮੁਰਾਰੀ ਜੀਉ ॥੨॥ ਜਨਮ ਮਰਨ ਕਉ ਇਹੁ ਜਗੁ ਬਪੜੋ ਇਨਿ ਦੂਜੈ ਭਗਤਿ ਵਿਸਾਰੀ ਜੀਉ ॥ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਈਐ ਸਾਕਤ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ਜੀਉ ॥੩॥ ਸਤਿਗੁਰ ਬੰਧਨ ਤੋੜਿ ਨਿਰਾਰੇ ਬਹੁੜਿ ਨ ਗਰਭ ਮਝਾਰੀ ਜੀਉ ॥ ਨਾਨਕ ਗਿਆਨ ਰਤਨੁ ਪਰਗਾਸਿਆ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ਜੀਉ ॥੪॥੮॥
ਅਰਥ: ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੧ ॥ ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ ਜੀ! ਤੂੰ ਸਾਨੂੰ ਸਭ ਪਦਾਰਥ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਹੈਂ, ਦਾਤਾਂ ਦੇਣ ਵਿਚ ਤੂੰ ਕਦੇ ਖੁੰਝਦਾ ਨਹੀਂ, ਅਸੀ ਤੇਰੇ (ਦਰ ਦੇ) ਮੰਗਤੇ ਹਾਂ । ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਕੇਹੜੀ ਸ਼ੈ ਮੰਗਾਂ? ਕੋਈ ਸ਼ੈ ਸਦਾ ਟਿਕੀ ਰਹਿਣ ਵਾਲੀ ਨਹੀਂ । (ਹਾਂ, ਤੇਰਾ ਨਾਮ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਹੈ) ਹੇ ਹਰੀ! ਮੈਨੂੰ ਆਪਣਾ ਨਾਮ ਦੇਹ, ਮੈਂ ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰਾਂ ।੧। ਪਰਮਾਤਮਾ ਹਰੇਕ ਸਰੀਰ ਵਿਚ ਵਿਆਪਕ ਹੈ । ਪਾਣੀ ਵਿਚ ਧਰਤੀ ਵਿਚ, ਧਰਤੀ ਦੇ ਉਪਰ ਆਕਾਸ਼ ਵਿਚ ਹਰ ਥਾਂ ਮੌਜੂਦ ਹੈ ਪਰ ਲੁਕਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ । (ਹੇ ਮਨ!) ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਉਸ ਨੂੰ ਵੇਖ ।ਰਹਾਉ। (ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਉੱਤੇ) ਗੁਰੂ ਨੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੇ ਕਿਰਪਾ ਕੀਤੀ ਉਸ ਨੂੰ ਉਸ ਨੇ ਧਰਤੀ ਆਕਾਸ਼ ਪਾਤਾਲ (ਸਾਰਾ ਜਗਤ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਹੋਂਦ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ) ਵਿਖਾ ਦਿੱਤਾ । ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ ਜੂਨਾਂ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ, ਹੁਣ ਭੀ ਮੌਜੂਦ ਹੈ ਅਗਾਂਹ ਨੂੰ ਮੌਜੂਦ ਰਹੇਗਾ, (ਹੇ ਭਾਈ!) ਉਸ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ (ਵੱਸਦਾ) ਵੇਖ ।੨। ਇਹ ਭਾਗ-ਹੀਣ ਜਗਤ ਜਨਮ ਮਰਨ ਦਾ ਗੇੜ ਸਹੇੜ ਬੈਠਾ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਇਸ ਨੇ ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਵਿਚ ਪੈ ਕੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਭਗਤੀ ਭੁਲਾ ਦਿੱਤੀ ਹੈ । ਜੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪਏ ਤਾਂ ਗੁਰੂ ਦੇ ਉਪਦੇਸ਼ ਤੇ ਤੁਰਿਆਂ (ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਭਗਤੀ) ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਪਰ ਮਾਇਆ-ਵੇੜ੍ਹੇ ਜੀਵ (ਭਗਤੀ ਤੋਂ ਖੁੰਝ ਕੇ ਮਨੁੱਖਾ ਜਨਮ ਦੀ) ਬਾਜ਼ੀ ਹਾਰ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ।੩। ਹੇ ਸਤਿਗੁਰੂ! ਮਾਇਆ ਦੇ ਬੰਧਨ ਤੋੜ ਕੇ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਬੰਦਿਆਂ ਨੂੰ ਤੂੰ ਮਾਇਆ ਤੋਂ ਨਿਰਲੇਪ ਕਰ ਦੇਂਦਾ ਹੈਂ, ਉਹ ਮੁੜ ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੇ ਗੇੜ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦਾ । ਹੇ ਨਾਨਕ! (ਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ) ਗਿਆਨ ਦਾ ਰਤਨ ਚਮਕ ਪੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਹਰੀ ਨਿਰੰਕਾਰ (ਆਪ) ਆ ਵੱਸਦਾ ਹੈ ।੪।੮।

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