ਅੰਗ : 963
सलोक मः ५ ॥ अम्रित बाणी अमिउ रसु अम्रितु हरि का नाउ ॥ मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर गुण गाउ ॥ उपदेसु सुणहु तुम गुरसिखहु सचा इहै सुआउ ॥ जनमु पदारथु सफलु होइ मन महि लाइहु भाउ ॥ सूख सहज आनदु घणा प्रभ जपतिआ दुखु जाइ ॥ नानक नामु जपत सुखु ऊपजै दरगह पाईऐ थाउ ॥१॥ मः ५ ॥ नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥ भाणै जप तप संजमो भाणै ही कढि लेइ ॥ भाणै जोनि भवाईऐ भाणै बखस करेइ ॥ भाणै दुखु सुखु भोगीऐ भाणै करम करेइ ॥ भाणै मिटी साजि कै भाणै जोति धरेइ ॥ भाणै भोग भोगाइदा भाणै मनहि करेइ ॥ भाणै नरकि सुरगि अउतारे भाणै धरणि परेइ ॥ भाणै ही जिसु भगती लाए नानक विरले हे ॥२॥
पउड़ी ॥ वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥ पसू परेत अगिआन उधारे इक खणे ॥ दिनसु रैणि तेरा नाउ सदा सद जापीऐ ॥ त्रिसना भुख विकराल नाइ तेरै ध्रापीऐ ॥ रोगु सोगु दुखु वंञै जिसु नाउ मनि वसै ॥ तिसहि परापति लालु जो गुर सबदी रसै ॥ खंड ब्रहमंड बेअंत उधारणहारिआ ॥ तेरी सोभा तुधु सचे मेरे पिआरिआ ॥१२॥
ਅਰਥ: प्रभू का नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है, अमृत का स्वाद देने वाला है; (हे भाई!) सतिगुरू की अमृत बरसाने वाली बाणी के द्वारा इस प्रभू नाम को मन में, शरीर में, हृदय में सिमरो और आठों पहर प्रभू की सिफत सालाह करो।
हे गुर-सिखो! (सिफतसालाह वाला यह) उपदेश सुनो, जिंदगी का असल मनोरथ यही है। मन में (प्रभू का) प्यार टिकाओ, ये मानस-जीवन रूपी बहुमूल्य निधि सफल हो जाएगी। प्रभू का सिमरन करने से दुख दूर हो जाता है, सुख, आत्मिक अडोलता और बेअंत खुशी प्राप्त होती है। हे नानक! प्रभू का नाम जपने से (इस लोक में) सुख पैदा होता है और प्रभू की हजूरी में जगह मिलती है।1। हे नानक! पूरा गुरू (तो यह) मति देता है कि प्रभू का नाम सिमरना चाहिए; (पर वैसे) जप तप संजम (आदिक कर्म-काण्ड) प्रभू की रजा में ही हो रहे हैं, रजा अनुसार ही प्रभू (इस कर्म-काण्ड में से जीवों को) निकाल लेता है।
प्रभू की रजा अनुसार ही जीव जूनियों में भटकता है, रजा में ही प्रभू (जीव पर) बख्शिश करता है। उसकी रजा में ही (जीव को) दुख-सुख भोगना पड़ता है, अपनी रजा अनुसार ही प्रभू (जीवों पर) मेहर करता है।
प्रभू अपनी रजा में ही शरीर बना के (उस में) जीवन डाल देता है, रजा में ही भोगों की ओर प्रेरता है और रजा के अनुसार ही भोगों से रोकता है।
अपनी रजा अनुसार ही प्रभू (किसी को) नर्क में (किसी को) स्वर्ग में डालता है, प्रभू की रजा में ही जीव का नाश हो जाता है। अपनी रजा अनुसार ही जिस मनुष्य को बँदगी में जोड़ता है (वह मनुष्य बँदगी करता है, पर)हे नानक! बँदगी करने वाले बँदे बहुत ही विरले विरले हैं।2। प्रभू के सच्चे नाम की सिफतें (करके और) सुन-सुन के मेरे अंदर जान पड़ जाती है (मुझे आत्मिक जीवन हासिल होता है), (प्रभू का नाम) पशु-स्वभाव, प्रेत-स्वभाव और ज्ञान-हीनों का एक छिन में उद्धार कर देता है।
हे प्रभू! दिन-रात सदा ही तेरा नाम जपना चाहिए, तेरे नाम के द्वारा (माया की) डरावनी भूख-प्यास मिट जाती है।
जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम बस जाता है उसके मन में से (विकार-) रोग संशय और दुख दूर हो जाते हैं। पर ये नाम हीरा उस मनुष्य को ही हासिल होता है जो गुरू के शबद में रच-मिच जाता है।
हे खंडों-ब्रहमण्डों के बेअंत जीवों का उद्धार करने वाले प्रभू! हे सदा स्थिर रहने वाले मेरे प्यारे! तेरी शोभा तुझे ही फबती है (अपनी महानता को तू स्वयं ही जानता है)।12।
ਬਾਬਾ ਦੀਪ ਸਿੰਘ ਸ਼ੂਰਵੀਰ ਬਲਵਾਨ ,
ਧਰਮ ਲਈ ਦਿੱਤਾ ਸੀਸ ਕੁਰਬਾਨ ।
ਖੰਡੇ ਦੀ ਧਾਰ ‘ਤੇ ਲੜਦੇ ਰਹੇ ,
ਸਿੱਖੀ ਦੇ ਚਾਨਣ ਨੂੰ ਸਾਂਭਦੇ ਰਹੇ ।
ਸ਼੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਹਰਿਰਾਇ ਜੀ ਦੇ
ਗੁਰਗੱਦੀ ਦਿਵਸ ਦੀਆਂ
ਸਮੂਹ ਸੰਗਤਾਂ ਨੂੰ ਲੱਖ-ਲੱਖ
ਵਧਾਈਆਂ ਹੋਵਣ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ
ਅੰਗ : 706
सलोक ॥ रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥ सासि सासि सिमरंति नानक महा अगनि न बिनासनं ॥१॥ मुखु तलै पैर उपरे वसंदो कुहथड़ै थाइ ॥ नानक सो धणी किउ विसारिओ उधरहि जिस दै नाइ ॥२॥ पउड़ी ॥ रकतु बिंदु करि निमिआ अगनि उदर मझारि ॥ उरध मुखु कुचील बिकलु नरकि घोरि गुबारि ॥ हरि सिमरत तू ना जलहि मनि तनि उर धारि ॥ बिखम थानहु जिनि रखिआ तिसु तिलु न विसारि ॥ प्रभ बिसरत सुखु कदे नाहि जासहि जनमु हारि ॥२॥
ਅਰਥ: जो परमात्मा जीवों की बनतर बनाता है उनको माँ के पेट में जगह देता है, हे नानक! जीव उसको हरेक सांस के साथ-साथ याद करते हैं और (माँ के पेट की) बड़ी ( भयानक) आग उनका नाश नहीं कर सकती।1।
हे नानक! (कह– हे भाई!) जब तेरा मुँह नीचे को था, पैर ऊपर की तरफ थे, बड़ी मुश्किल जगह में तू बसता था तब जिस प्रभू के नाम की बरकति से तू बचा रहा, अब उस मालिक को तूने क्यों भुला दिया?।2। (हे जीव!) (माँ के) रक्त और (पिता के) वीर्य से (माँ के) पेट की आग में तू उगा। तेरा मुँह नीचे को था, गंदा और डरावना था, (जैसे) एक अंधेरे घोर नर्क में पड़ा हुआ था। जिस प्रभू को सिमर के तू जलता नहीं था- उसको (अब भी) मन से तन से हृदय में याद कर। जिस प्रभू ने तुझे मुश्किल जगह से बचाया, उसको रक्ती भर भी ना भुला।
प्रभू को भुलाने से कभी सुख नहीं मिलता, (अगर भुलाएगा तो) मानस जन्म (की बाजी) हार के जाएगा।2
ਅੰਗ : 706
ਸਲੋਕ ॥ ਰਚੰਤਿ ਜੀਅ ਰਚਨਾ ਮਾਤ ਗਰਭ ਅਸਥਾਪਨੰ ॥ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰੰਤਿ ਨਾਨਕ ਮਹਾ ਅਗਨਿ ਨ ਬਿਨਾਸਨੰ ॥੧॥ ਮੁਖੁ ਤਲੈ ਪੈਰ ਉਪਰੇ ਵਸੰਦੋ ਕੁਹਥੜੈ ਥਾਇ ॥ ਨਾਨਕ ਸੋ ਧਣੀ ਕਿਉ ਵਿਸਾਰਿਓ ਉਧਰਹਿ ਜਿਸ ਦੈ ਨਾਇ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਰਕਤੁ ਬਿੰਦੁ ਕਰਿ ਨਿੰਮਿਆ ਅਗਨਿ ਉਦਰ ਮਝਾਰਿ ॥ ਉਰਧ ਮੁਖੁ ਕੁਚੀਲ ਬਿਕਲੁ ਨਰਕਿ ਘੋਰਿ ਗੁਬਾਰਿ ॥ ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਤੂ ਨਾ ਜਲਹਿ ਮਨਿ ਤਨਿ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥ ਬਿਖਮ ਥਾਨਹੁ ਜਿਨਿ ਰਖਿਆ ਤਿਸੁ ਤਿਲੁ ਨ ਵਿਸਾਰਿ ॥ ਪ੍ਰਭ ਬਿਸਰਤ ਸੁਖੁ ਕਦੇ ਨਾਹਿ ਜਾਸਹਿ ਜਨਮੁ ਹਾਰਿ ॥੨॥
ਅਰਥ: ਜੋ ਪਰਮਾਤਮਾ ਜੀਵਾਂ ਦੀ ਬਣਤਰ ਬਣਾਉਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਮਾਂ ਦੇ ਪੇਟ ਵਿਚ ਥਾਂ ਦੇਂਦਾ ਹੈ, ਹੇ ਨਾਨਕ! ਜੀਵ ਉਸ ਨੂੰ ਹਰੇਕ ਸਾਹ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਯਾਦ ਕਰਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ ਤੇ (ਮਾਂ ਦੇ ਪੇਟ ਦੀ) ਵੱਡੀ (ਭਿਆਨਕ) ਅੱਗ ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਨਾਸ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੀ।੧।
ਹੇ ਨਾਨਕ! ਆਖ-ਹੇ ਭਾਈ!) ਜਦੋਂ ਤੇਰਾ ਮੂੰਹ ਹੇਠਾਂ ਨੂੰ ਸੀ, ਪੈਰ ਉਤਾਂਹ ਨੂੰ ਸਨ, ਬੜੇ ਔਖੇ ਥਾਂ ਤੂੰ ਵੱਸਦਾ ਸੈਂ ਤਦੋਂ ਜਿਸ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਤੂੰ ਬਚਿਆ ਰਿਹਾ, ਹੁਣ ਉਸ ਮਾਲਕ ਨੂੰ ਤੂੰ ਕਿਉਂ ਭੁਲਾ ਦਿੱਤਾ?।੨। (ਹੇ ਜੀਵ!) (ਮਾਂ ਦੀ) ਰੱਤ ਤੇ (ਪਿਉ ਦੇ) ਵੀਰਜ ਤੋਂ (ਮਾਂ ਦੇ) ਪੇਟ ਦੀ ਅੱਗ ਵਿਚ ਤੂੰ ਉੱਗਿਆ। ਤੇਰਾ ਮੂੰਹ ਹੇਠਾਂ ਨੂੰ ਸੀ, ਗੰਦਾ ਤੇ ਡਰਾਉਣਾ ਸੈਂ, (ਮਾਨੋ) ਇਕ ਹਨੇਰੇ ਘੋਰ ਨਰਕ ਵਿਚ ਪਿਆ ਹੋਇਆ ਸੈਂ। ਜਿਸ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਸਿਮਰ ਕੇ ਤੂੰ ਨਹੀਂ ਸੈਂ ਸੜਦਾ-ਉਸ ਨੂੰ (ਹੁਣ ਭੀ) ਮਨੋਂ ਤਨੋਂ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਯਾਦ ਕਰ। ਜਿਸ ਪ੍ਰਭੂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ ਔਖੇ ਥਾਂ ਤੋਂ ਬਚਾਇਆ, ਉਸ ਨੂੰ ਰਤਾ ਭੀ ਨਾਹ ਭੁਲਾ।
ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਭੁਲਾਇਆਂ ਕਦੇ ਸੁਖ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, (ਜੇ ਭੁਲਾਇਂਗਾ ਤਾਂ) ਮਨੁੱਖਾ ਜਨਮ (ਦੀ ਬਾਜ਼ੀ) ਹਾਰ ਕੇ ਜਾਵੇਂਗਾ।੨।
ਮਨ ਰੇ ਕਹਾ ਭਇਓ ਤੈ ਬਉਰਾ।।
ਅਹਿਨਿਸਿ ਅਉਧ ਘਟੈ ਨਹੀ ਜਾਨੈ ਭਇਓ ਲੋਭ ਸੰਗਿ ਹਉਰਾ ।।
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ, ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ।”
ਹੇ ਨਾਨਕ! (ਆਖ) ਜੋ ਇਨਸਾਨ ਨਾਮ ਜਪਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦੀ ਆਤਮਕ ਅਵਸਥਾ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਵਿੱਚ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਅਸੀਂ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਭਾਣੇ ਵਿੱਚ ਰਹਿ ਕੇ ਸਾਰੇ ਸੰਸਾਰ ਦੀ ਭਲਾਈ ਦੀ ਅਰਦਾਸ ਕਰੀਏ।
ਅੰਗ : 706
सलोक ॥*
*मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥ खंडणं कलि कलेसह प्रभ सिमरि नानक नह दूरणह ॥१॥ हभि रंग माणहि जिसु संगि तै सिउ लाईऐ नेहु ॥ सो सहु बिंद न विसरउ नानक जिनि सुंदरु रचिआ देहु ॥२॥ पउड़ी ॥ जीउ प्रान तनु धनु दीआ दीने रस भोग ॥ ग्रिह मंदर रथ असु दीए रचि भले संजोग ॥ सुत बनिता साजन सेवक दीए प्रभ देवन जोग ॥ हरि सिमरत तनु मनु हरिआ लहि जाहि विजोग ॥ साधसंगि हरि गुण रमहु बिनसे सभि रोग ॥३॥
ਅਰਥ: हे नानक जी! जो प्रभू हमें मन-इच्छत दातां देता है जो सब जगह (सब जीवों की) उम्मीदें पूरी करता है, जो हमारे झगड़े और कलेश नाश करने वाला है उस को याद कर, वह तेरे से दूर नहीं है ॥१॥ जिस प्रभू की बरकत से तुम सभी आनंद मानते हो, उस से प्रीत जोड़। जिस प्रभू ने तुम्हारा सुंदर शरीर बनाया है, हे नानक जी! रब कर के वह तुझे कभी भी न भूले ॥२॥ (प्रभू ने तुझे) जिंद प्राण शरीर और धन दिया और स्वादिष्ट पदार्थ भोगणें को दिए। तेरे अच्छे भाग बना कर, तुझे उस ने सुंदर घर, रथ और घोडे दिए। सब कुछ देने-वाले प्रभू ने तुझे पुत्र, पत्नी मित्र और नौकर दिए। उस प्रभू को सिमरनें से मन तन खिड़िया रहता है, सभी दुख खत्म हो जाते हैं। (हे भाई!) सत्संग में उस हरी के गुण चेते किया करो, सभी रोग (उस को सिमरनें से) नाश हो जाते हैं ॥३॥
ਅੰਗ : 706
ਸਲੋਕ ॥*
*ਮਨ ਇਛਾ ਦਾਨ ਕਰਣੰ ਸਰਬਤ੍ਰ ਆਸਾ ਪੂਰਨਹ ॥ ਖੰਡਣੰ ਕਲਿ ਕਲੇਸਹ ਪ੍ਰਭ ਸਿਮਰਿ ਨਾਨਕ ਨਹ ਦੂਰਣਹ ॥੧॥ ਹਭਿ ਰੰਗ ਮਾਣਹਿ ਜਿਸੁ ਸੰਗਿ ਤੈ ਸਿਉ ਲਾਈਐ ਨੇਹੁ ॥ ਸੋ ਸਹੁ ਬਿੰਦ ਨ ਵਿਸਰਉ ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਸੁੰਦਰੁ ਰਚਿਆ ਦੇਹੁ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਜੀਉ ਪ੍ਰਾਨ ਤਨੁ ਧਨੁ ਦੀਆ ਦੀਨੇ ਰਸ ਭੋਗ ॥ ਗ੍ਰਿਹ ਮੰਦਰ ਰਥ ਅਸੁ ਦੀਏ ਰਚਿ ਭਲੇ ਸੰਜੋਗ ॥ ਸੁਤ ਬਨਿਤਾ ਸਾਜਨ ਸੇਵਕ ਦੀਏ ਪ੍ਰਭ ਦੇਵਨ ਜੋਗ ॥ ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਤਨੁ ਮਨੁ ਹਰਿਆ ਲਹਿ ਜਾਹਿ ਵਿਜੋਗ ॥ ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਰਮਹੁ ਬਿਨਸੇ ਸਭਿ ਰੋਗ ॥੩॥
ਅਰਥ: ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਜੋ ਪ੍ਰਭੂ ਅਸਾਨੂੰ ਮਨ-ਮੰਨੀਆਂ ਦਾਤਾਂ ਦੇਂਦਾ ਹੈ ਜੋ ਸਭ ਥਾਂ (ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦੀਆਂ) ਆਸਾਂ ਪੂਰੀਆਂ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਅਸਾਡੇ ਝਗੜੇ ਤੇ ਕਲੇਸ਼ ਨਾਸ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਹੈ ਉਸ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰ, ਉਹ ਤੈਥੋਂ ਦੂਰ ਨਹੀਂ ਹੈ ॥੧॥ ਜਿਸ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਤੂੰ ਸਾਰੀਆਂ ਮੌਜਾਂ ਮਾਣਦਾ ਹੈਂ, ਉਸ ਨਾਲ ਪ੍ਰੀਤ ਜੋੜ। ਜਿਸ ਪ੍ਰਭੂ ਨੇ ਤੇਰਾ ਸੋਹਣਾ ਸਰੀਰ ਬਣਾਇਆ ਹੈ, ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਰੱਬ ਕਰ ਕੇ ਉਹ ਤੈਨੂੰ ਕਦੇ ਭੀ ਨਾਹ ਭੁੱਲੇ ॥੨॥ (ਪ੍ਰਭੂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ) ਜਿੰਦ ਪ੍ਰਾਣ ਸਰੀਰ ਤੇ ਧਨ ਦਿੱਤਾ ਤੇ ਸੁਆਦਲੇ ਪਦਾਰਥ ਭੋਗਣ ਨੂੰ ਦਿੱਤੇ। ਤੇਰੇ ਚੰਗੇ ਭਾਗ ਬਣਾ ਕੇ, ਤੈਨੂੰ ਉਸ ਨੇ ਘਰ ਸੋਹਣੇ ਮਕਾਨ, ਰਥ ਤੇ ਘੋੜੇ ਦਿੱਤੇ। ਸਭ ਕੁਝ ਦੇਣ-ਜੋਗੇ ਪ੍ਰਭੂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ ਪੁੱਤਰ, ਵਹੁਟੀ ਮਿੱਤ੍ਰ ਤੇ ਨੌਕਰ ਦਿੱਤੇ। ਉਸ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਸਿਮਰਿਆਂ ਮਨ ਤਨ ਖਿੜਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਸਾਰੇ ਦੁੱਖ ਮਿਟ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। (ਹੇ ਭਾਈ!) ਸਤਸੰਗ ਵਿਚ ਉਸ ਹਰੀ ਦੇ ਗੁਣ ਚੇਤੇ ਕਰਿਆ ਕਰੋ, ਸਾਰੇ ਰੋਗ (ਉਸ ਨੂੰ ਸਿਮਰਿਆਂ) ਨਾਸ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ॥੩॥
ਅੰਗ : 671
धनासरी मः ५ ॥ जब ते दरसन भेटे साधू भले दिनस ओइ आए ॥ महा अनंदु सदा करि कीरतनु पुरख बिधाता पाए ॥१॥ अब मोहि राम जसो मनि गाइओ ॥ भइओ प्रगासु सदा सुखु मन महि सतिगुरु पूरा पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥ गुण निधानु रिद भीतरि वसिआ ता दूखु भरम भउ भागा ॥ भई परापति वसतु अगोचर राम नामि रंगु लागा ॥२॥ चिंत अचिंता सोच असोचा सोगु लोभु मोहु थाका ॥ हउमै रोग मिटे किरपा ते जम ते भए बिबाका ॥३॥ गुर की टहल गुरू की सेवा गुर की आगिआ भाणी ॥ कहु नानक जिनि जम ते काढे तिसु गुर कै कुरबाणी ॥४॥४॥
ਅਰਥ: हे भाई! जब से गुरू के दर्शन प्राप्त हुए हैं, मेरे इस तरह के अच्छे दिन आ गए, कि परमात्मा की सिफ़त-सलाह कर कर के सदा मेरे अंदर सुख बना रहता है, मुझे सर्व-व्यापक करतार मिल गया है ॥१॥ हे भाई! मुझे पूरा गुरू मिल गया है, (इस लिए उस की कृपा के साथ) अब मैं परमात्मा की सिफ़त-सलाह (अपने) मन में गा रहा हूँ, (मेरे अंदर आत्मिक जीवन की) रोशनी हो गई है, मेरे मन में सदा आनंद बना रहता है ॥१॥ रहाउ ॥ (हे भाई! गुरू की कृपा के साथ जब से) गुणों का ख़ज़ाना परमात्मा मेरे हृदय में आ वसा है, तब से मेरा दु:ख भ्रम डर दूर हो गया है। परमात्मा के नाम में मेरा प्यार बन गया है, मुझे (वह उत्तम) चीज़ प्राप्त हो गई है जिस तक ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती ॥२॥ (हे भाई! गुरू के दर्शन की बरकत के साथ) मैं सभी चिंताओं और सोचों से बच गया हूँ, (मेरे अंदर से) ग़म ख़त्म हो गया है, लोभ ख़त्म हो गया है, मोह दूर हो गया है। (गुरू की) कृपा के साथ (मेरे अंदर से) अहंकार आदि रोग मिट गए हैं, मुझे यम-राज से भी कोई डर नहीं लगता ॥३॥ हे भाई! अब मुझे गुरू की टहल-सेवा, गुरू की रज़ा ही प्यारी लगती है। नानक जी कहते हैं – (हे भाई! मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ, जिस ने मुझे यमों से बचा लिया है ॥४॥४॥*

