अमृत वेले का हुक्मनामा – 05 अगस्त 2026
अंग : 790
सलोक मः १ ॥ सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं सम्रथु दातारु ॥ हउमै गरबु निवारीऐ कामु क्रोधु अहंकारु ॥ लबु लोभु परजालीऐ नामु मिलै आधारु ॥ अहिनिसि नवतन निरमला मैला कबहूं न होइ ॥ नानक इह बिधि छुटीऐ नदरि तेरी सुखु होइ ॥१॥
अर्थ: हे गुरु! तू बक्शीश करने योग्य है, मुझे ख़ैर दे(नाम की), (ताकि) मेरी हौमय मेरा अहंकार काम क्रोध दूर हो जाए। (हे गुरु! तेरे दर से मुझे) प्रभु का नाम (जिन्दगी के लिए) सहारा मिल जाए और मेरी चस्का और लोभ पूरी तरहे जल जाए। प्रभु का नाम दिन रात नए से नया होता है (भाव, जैसे जैसे जपें, इस के साथ प्यार बढ़ता है) 'नाम' पवित्र है, (यह कभी मैला नहीं होता। (तभी तो) हे नानक! 'नाम' जपने से (हौमय के) चक्कर से बचते हैं। हे प्रभु! यह सुख तेरी कृपा की नजर के साथ मिलता है॥१॥

