अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 4 मई 2024

सूही महला ५ ॥ धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥ मानै हुकमु तजै अभिमानै ॥ प्रिअ सिउ राती रलीआ मानै ॥१॥ सुनि सखीए प्रभ मिलण नीसानी ॥ मनु तनु अरपि तजि लाज लोकानी ॥१॥ रहाउ ॥ सखी सहेली कउ समझावै ॥ सोई कमावै जो प्रभ भावै ॥ सा सोहागणि अंकि समावै ॥२॥

हे सहेली! वह जीव-स्त्री प्रशंसा योग्य है, सुहाग-भाग्य वाली है, जो प्रभु-पति के साथ साँझ बनाती है, जो अहंकार छोड़ कर के प्रभु-पति का हुकम मानती रहती है। वह जीव-स्त्री प्रभु-पति (के प्यार) में रंगी हुई उस के मिलाप का आनंद मनाती रहती है॥1॥ हे सखी! परमात्मा मिल्न्बे की निशानी (मुझसे) सुन ले। (वह निशानी वह तरीका है कि ) लाज की खातिर छोड़ कर अपना मन अपना सरीर परमात्मा के हवाले कर दे॥1॥रहाउ॥ (एक सत्संगी) सहेली (दूसरी सत्संगी) सहेली को (प्रभु-पति के मिलाप के तरीके के बारे में) ( है और कहती है कि) जो जीव-स्त्री वह सब करती है जो प्रभु-पति को आ है, वह सुहाग भाग्य जीव-स्त्री उस प्रभु के चरणों में लीन रहती है॥2॥


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