संधिआ ​​वेले का हुक्मनामा – 28 जून 2026

अंग : 719
बैराड़ी महला ४ ॥ हरि जनु राम नाम गुन गावै ॥ जे कोई निंद करे हरि जन की अपुना गुनु न गवावै ॥१॥ रहाउ ॥ जो किछु करे सु आपे सुआमी हरि आपे कार कमावै ॥ हरि आपे ही मति देवै सुआमी हरि आपे बोलि बुलावै ॥१॥ हरि आपे पंच ततु बिसथारा विचि धातू पंच आपि पावै ॥ जन नानक सतिगुरु मेले आपे हरि आपे झगरु चुकावै ॥२॥३॥
अर्थ: परमात्मा का भक्त हर समय परमात्मा के गुण गाता रहता है। अगर कोई मनुख उस भक्त की निंदा (भी) करता है तो वह भक्त अपना सवभाव नहीं छोड़ता॥१॥रहाउ॥ (भक्त अपनी निंदा सुन के भी अपना सवभाव नहीं छोड़ता, क्योंकि वह जनता है कि) जो कुछ कर रहा है मालिक प्रभु आप ही (जीवों में बैठ के) कर रहा है, वह आप ही हरेक काम कर रहा है। मालिक प्रभु आप ही (हरेक जीव को )समझ देता है, आप ही (हरेक जीव में बैठा) बोल रहा है, आप ही (हरेक जीव को) बोलने की प्रेरणा कर रहा है॥१॥ (भक्त जनता है कि) परमात्मा ने आप ही (अपने आप से) पञ्च तत्वों का जगत-बिखेरा हुआ है, आप ही इन पञ्च तत्वों में पांच विषय भरे हुए हैं। गुरू नानक जी कहते हैं, हे नानक! परमात्मा आप ही अपने सेवक को मिलाता है, और, आप ही (उस के अंदर से हरेक प्रकार कि) खिंच तान ख़तम करता है॥२॥३॥


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