अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 27 जून 2026

अंग : 796
बिलावलु महला ३ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ ध्रिगु ध्रिगु खाइआ ध्रिगु ध्रिगु सोइआ ध्रिगु ध्रिगु कापड़ु अंगि चड़ाइआ ॥ ध्रिगु सरीरु कुट्मब सहित सिउ जितु हुणि खसमु न पाइआ ॥ पउड़ी छुड़की फिरि हाथि न आवै अहिला जनमु गवाइआ ॥१॥दूजा भाउ न देई लिव लागणि जिनि हरि के चरण विसारे ॥ जगजीवन दाता जन सेवक तेरे तिन के तै दूख निवारे ॥१॥ रहाउ॥तू दइआलु दइआपति दाता किआ एहि जंत विचारे ॥ मुकत बंध सभि तुझ ते होए ऐसा आखि वखाणे ॥ गुरमुखि होवै सो मुकतु कहीऐ मनमुख बंध विचारे ॥२॥सो जनु मुकतु जिसु एक लिव लागी सदा रहै हरि नाले ॥ तिन की गहण गति कही न जाई सचै आपि सवारे ॥ भरमि भुलाणे सि मनमुख कहीअहि ना उरवारि न पारे ॥३॥जिस नो नदरि करे सोई जनु पाए गुर का सबदु सम्हाले ॥ हरि जन माइआ माहि निसतारे ॥ नानक भागु होवै जिसु मसतकि कालहि मारि बिदारे ॥४॥१॥
अर्थ: हे भाई! अगर इस शरीर के द्वारा इस जनम में पति-प्रभु का मिलाप हासिल नहीं किया, तो यह शरीर धिक्कार-योग्य है, (नाक-कान-आँखों आदि सारे) परिवार समेत धिक्कार-योग्य है। (मनुष्य का सब कुछ) खाना धिक्कार-योग्य है, सोना (सुख-आराम) धिक्कार-योग्य है, शरीर पर कपड़ा पहनना धिक्कार-योग्य है। (हे भाई! यह मनुष्य का शरीर प्रभु के देश में पहुँचने के लिए सीढ़ी है) अगर यह सीढ़ी (हाथ से) निकल जाए तो दोबारा हाथ में नहीं आती। मनुष्य अपना बहुत ही कीमती जीवन गवा लेता है।1।हे भाई! माया का मोह, जिसने (जीवों को) परमात्मा के चरण (मन में बसाने) भुला दिए हैं, (परमात्मा के चरणों में) तवज्जो जोड़ने नहीं देता। हे प्रभू्! तू खुद ही जगत को आत्मिक जीवन देने वाला है। जो बँदे तेरे सेवक बनते हैं, उनके तूने (मोह से पैदा होने वाले सारे) दुख दूर कर दिए हैं।1। रहाउ।हे प्रभु! तू (खुद ही) दया का घर है, दया का मालिक है, तू स्वयं ही (अपने चरणों की प्रीत) देने वाला है (तेरे पैदा किए हुए) इन जीवों के वश में कुछ नहीं। तेरे ही हुक्म में ही कई जीव माया के मोह से आजाद हो जाते हैं, कई जीव मोह में बँधे रहते हैं; कोई विरला गुरमुख ही ये बात कह के समझाता है। जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहता है वह माया के मोह से आजाद कहा जाता है, पर अपने मन के पीछे चलने वाले बिचारे मोह में बँधे रहते हैं।2।जिस मनुष्य की तवज्जो एक प्रभु में जुड़ी रहती है वह मनुष्य मोह से आजाद हो जाता है, वह सदा प्रभु-चरणों में जुड़ा रहता है। ऐसे लोगों की गहरी आत्मिक अवस्था को बयान नहीं किया जा सकता। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु ने खुद ही उनका जीवन सुंदर बना दिया होता है। पर, जो लोग माया की भटकना में पड़ कर जीवन-राह से टूटे रहते हैं, वे लोग मनमुख कहे जाते हैं (वे माया के मोह के समुंदर में डूबे रहते हैं) वे ना इस पार के लायक ना ही उस पार लांघने के काबिल।3।पर, जीव के भी क्या वश?) जिस मनुष्य पर प्रभु मेहर की निगाह करता है वही मनुष्य (गुरु का शब्द) प्राप्त करता है, वह मनुष्य गुरु के शब्द को अपने हृदय में संभाल के रखता है। (इसी तरह) प्रभु अपने सेवकों को माया में (रख के भी, मोह के समुंदर से) पार लंघा लेता है। हे नानक! जिस मनुष्य के माथे के भाग्य जाग उठते हैं, वह (अपने अंदर से) आत्मिक मौत को मार के खत्म कर देता है।4।1।


Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Begin typing your search term above and press enter to search. Press ESC to cancel.

Back To Top