अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 20 जून 2026

अंग : 604
आपे आपि वरतदा पिआरा आपे आपि अपाहु ॥ वणजारा जगु आपि है पिआरा आपे साचा साहु ॥ आपे वणजु वापारीआ पिआरा आपे सचु वेसाहु ॥१॥ जपि मन हरि हरि नामु सलाह ॥ गुर किरपा ते पाईऐ पिआरा अमृतु अगम अथाह ॥ रहाउ ॥ आपे सुणि सभ वेखदा पिआरा मुखि बोले आपि मुहाहु ॥ आपे उझड़ि पाइदा पिआरा आपि विखाले राहु ॥ आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे वेपरवाहु ॥२॥ आपे आपि उपाइदा पिआरा सिरि आपे धंधड़ै लाहु ॥ आपि कराए साखती पिआरा आपि मारे मरि जाहु ॥ आपे पतणु पातणी पिआरा आपे पारि लंघाहु ॥३॥ आपे सागरु बोहिथा पिआरा गुरु खेवटु आपि चलाहु ॥ आपे ही चड़ि लंघदा पिआरा करि चोज वेखै पातिसाहु ॥ आपे आपि दइआलु है पिआरा जन नानक बखसि मिलाहु ॥४॥१॥

अर्थ: हे भाई! प्रभु स्वयं ही हर स्थान पर मौजूद है, और व्यापक होते हुए भी स्वयं ही निर्लेप भी है। यह संसार रूपी व्यापारी भी प्रभु स्वयं ही है, और संसार-व्यापारी को पूंजी देने वाला सदा कायम रहने वाला प्रभु स्वयं ही साहूकार है। प्रभु स्वयं ही व्यापार है, स्वयं ही व्यापार करने वाला है, और स्वयं ही सदा स्थिर रहने वाली पूंजी है। ॥१॥

हे मेरे मन! सदा परमात्मा का नाम जपता रह, उसकी स्तुति और गुणगान करता रह। हे भाई! गुरु की कृपा से ही वह प्यारा प्रभु प्राप्त हो सकता है, जो आत्मिक जीवन देने वाला है, जो अगम्य है और बहुत अथाह है। ॥रहाउ॥

हे भाई! प्रभु स्वयं ही जीवों की अरदासें सुनकर सबकी संभाल करता है। स्वयं ही मुख से जीवों को धीरज देने के लिए मीठे वचन बोलता है। प्यारा प्रभु स्वयं ही जीवों को गलत राह पर भी डाल देता है, और स्वयं ही जीवन का सही रास्ता भी दिखाता है। हे भाई! हर जगह प्रभु स्वयं ही स्वयं है, और इतने संसार का मालिक होते हुए भी प्रभु बेपरवाह रहता है। ॥२॥

हे भाई! प्रभु स्वयं ही सब जीवों को पैदा करता है, स्वयं ही हर जीव को माया के काम-धंधों में लगाए रखता है। प्रभु स्वयं ही जीवों की रचना बनाता है, स्वयं ही मारता है, और तब उसका पैदा किया हुआ जीव मर जाता है। प्रभु स्वयं ही संसार-नदी का घाट है, स्वयं ही नाविक है, और स्वयं ही जीवों को पार उतारता है। ॥३॥

हे भाई! प्रभु स्वयं ही संसार-सागर है, स्वयं ही जहाज है, और स्वयं ही गुरु-नाविक बनकर जहाज को चलाता है। प्रभु स्वयं ही जहाज में चढ़कर पार उतरता है। प्रभु-पातशाह कौतुक और तमाशे करके स्वयं ही इन तमाशों को देख रहा है। हे नानक! कहो — प्रभु स्वयं ही सदा दया का स्रोत है; स्वयं ही बख्शिश करके अपने पैदा किए हुए जीवों को अपने साथ मिला लेता है। ॥४॥१॥


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