अमृत वेले का हुक्मनामा – 16 जून 2026
अंग : 601
सोरठि महला ३ ॥*
*हरि जीउ तुधु नो सदा सालाही पिआरे जिचरु घट अंतरि है सासा ॥ इकु पलु खिनु विसरहि तू सुआमी जाणउ बरस पचासा ॥ हम मूड़ मुगध सदा से भाई गुर कै सबदि प्रगासा ॥१॥ हरि जीउ तुम आपे देहु बुझाई ॥ हरि जीउ तुधु विटहु वारिआ सद ही तेरे नाम विटहु बलि जाई ॥ रहाउ ॥ हम सबदि मुए सबदि मारि जीवाले भाई सबदे ही मुकति पाई ॥ सबदे मनु तनु निरमलु होआ हरि वसिआ मनि आई ॥ सबदु गुर दाता जितु मनु राता हरि सिउ रहिआ समाई ॥२॥ सबदु न जाणहि से अंने बोले से कितु आए संसारा ॥ हरि रसु न पाइआ बिरथा जनमु गवाइआ जमहि वारो वारा ॥ बिसटा के कीड़े बिसटा माहि समाणे मनमुख मुगध गुबारा ॥३॥ आपे करि वेखै मारगि लाए भाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥ जो धुरि लिखिआ सु कोइ न मेटै भाई करता करे सु होई ॥ नानक नामु वसिआ मन अंतरि भाई अवरु न दूजा कोई ॥४॥४॥*
अर्थ: हे प्यारे प्रभू जी! (मेहर कर) जितना समय मेरे शरीर में जिंद है, मैं सदा तेरी सिफ़त-सलाह करता रहूँ। हे प्रभू! अगर तूँ मुझे एक पल-भर एक क्षण-भर भी भूलता हैं, मैं वह समय पचास साल बीत गए समझता हूँ। हे भाई! हम सदा से मूर्ख अनजान चले आ रहे थे, गुरू के श़ब्द की बरकत से (हमारे अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश हुआ है ॥१॥ हे प्रभू जी! तूँ आप ही (अपना नाम जपने की मुझे) समझ बख़्श़। हे प्रभू! मैं तुझसे सदा सदके जाऊं, मैं तेरे नाम से कुर्बान जाऊं ॥ रहाउ ॥ हे भाई! हम (जीव) गुरू के श़ब्द द्वारा (विकारों की तरफ़ से) मर सकते हैं, श़ब्द के द्वारा ही (विकारों की तरफ़ से) मन मार कर (गुरू) आत्मिक जीवन देता है। गुरू के श़ब्द में जुड़ने से ही विकारों से मुक्ति हासिल होती है, और मन पवित्र होता है, शरीर पवित्र होता है, और परमात्मा अंदर आ बसता है। गुरू का श़ब्द (ही नाम की दात) देने वाला है, जब श़ब्द में मन रंगा जाता है तो परमात्मा में लीन हो जाता है ॥२॥ जो मनुष्य गुरू के श़ब्द से साँझ नहीं पाते वह (माया के मोह में आत्मिक जीवन की तरफ़ से) अंधे बोले हुए रहते हैं, संसार में आ कर वह कुछ नहीं खटते। उनको प्रभू के नाम का स्वाद नहीं आता, वह अपना जीवन व्यर्थ गंवा जाते हैं, वह बार-बार जन्म मरण के चक्र में पड़े रहते हैं। जैसे गंद के कीड़े गंद में ही टिके रहते हैं, वैसे अपने मन के पीछे चलने वाले मूर्ख मनुष्य (अज्ञानता के) अंधेरे में ही (मस्त रहते हैं) ॥३॥ प्रभू आप ही (जीवों को) पैदा करके संभाल करता है, आप ही (जीवन के सही) रास्ते पाता है, उस प्रभू के अलावा अन्य कोई नहीं (जो जीवों को रास्ता बता सके)। करतार जो कुछ करता है वही होता है, धुर दरगाह से (जीवों के माथे पर लेख) लिख देता है, उस को कोई (अन्य) मिटा नहीं सकता। हे नानक जी! (उस प्रभू की मेहर से ही उसका) नाम (मनुष्य के) मन में वस सकता है, कोई अन्य यह दात देने योग्य नहीं है ॥४॥४॥

