अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 13 जून 2026

अंग : 802
रागु बिलावलु महला ५ घरु २ यानड़ीए कै घरि गावणा ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥ अवर सिआणपा बिरथीआ पिआरे राखन कउ तुम एक ॥१॥ रहाउ ॥ सतिगुरु पूरा जे मिलै पिआरे सो जनु होत निहाला ॥ गुर की सेवा सो करे पिआरे जिस नो होइ दइआला ॥ सफल मूरति गुरदेउ सुआमी सरब कला भरपूरे ॥ नानक गुरु पारब्रहमु परमेसरु सदा सदा हजूरे ॥१॥ सुणि सुणि जीवा सोइ तिना की जिन्ह अपुना प्रभु जाता ॥ हरि नामु अराधहि नामु वखाणहि हरि नामे ही मनु राता ॥ सेवकु जन की सेवा मागै पूरै करमि कमावा ॥ नानक की बेनंती सुआमी तेरे जन देखणु पावा ॥२॥ वडभागी से काढीअहि पिआरे संतसंगति जिना वासो ॥ अम्रित नामु अराधीऐ निरमलु मनै होवै परगासो ॥ जनम मरण दुखु काटीऐ पिआरे चूकै जम की काणे ॥ तिना परापति दरसनु नानक जो प्रभ अपणे भाणे ॥३॥ ऊच अपार बेअंत सुआमी कउणु जाणै गुण तेरे ॥ गावते उधरहि सुणते उधरहि बिनसहि पाप घनेरे ॥ पसू परेत मुगध कउ तारे पाहन पारि उतारै ॥ नानक दास तेरी सरणाई सदा सदा बलिहारै ॥४॥१॥४॥
अर्थ: हे प्यारे प्रभू! मेरे मन में (एक) तेरा ही आसरा है। हे प्यारे प्रभू! सिर्फ तू ही (हम जीवों की) रक्षा करने योग्य है। (तुझे भुला के रक्षा के लिए) और और चतुराईयाँ (सोचनी) किसी भी काम की नहीं।1। रहाउ।
हे भाई! जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाए, वह सदा खिला रहता है। पर हे भाई! वही मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है जिस पर (प्रभू खुद) दयावान होता है। हे भाई! गुरू स्वामी मानस जनम का मनोरथ पूरा करने में समर्थ है (क्योंकि) वह सारी ताकतों का मालिक है। हे नानक! गुरू परमात्मा का रूप है। (अपने सेवकों के) सदा ही अंग-संग रहता है।1।
हे भाई! जो मनुष्य अपने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाले रखते हैं, उनकी शोभा सुन-सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। (वे भाग्यशाली मनुष्य सदा) परमात्मा का नाम सिमरते हैं, परमात्मा का नाम उचारते हैं, परमात्मा के नाम में ही उनका मन रंगा रहता है। हे प्रभू! (तेरा यह) सेवक (तेरे उन) सेवकों की सेवा (की दाति तेरे पास से) माँगता है, (तेरी) पूर्ण बख्शिश से (ही) मैं (उनकी) सेवा की कार कर सकता हूँ। हे मालिक प्रभू! (तेरे सेवक) नानक की (तेरे दर पर) प्रार्थना है, (-मेहर कर) मैं तेरे सेवकों के दर्शन कर सकूँ।2।
हे भाई! जिन मनुष्यों का बैठना-उठना सदा गुरमुखों की संगति में है, वे मनुष्य अति भाग्यशाली कहे जा सकते हैं। (गुरमुखों की संगति में ही रह के) आत्मिक जीवन देने वाला पवित्र नाम सिमरा जा सकता है, और मन में (उच्च आत्मिक जीवन का) प्रकाश (ज्ञान) पैदा होता है। हे भाई! (गुरमुखों की संगति में ही) सारी उम्र दुख काटा जा सकता है, और यमराज की धौंस भी समाप्त हो जाती है। पर, हे नानक! (गुरमुखों के) दर्शन उन मनुष्यों को ही नसीब होते हैं जो अपने परमात्मा को प्यारे लगते हैं।3।
हे सबसे ऊँचे, अपार और बेअंत मालिक प्रभू! कोई भी मनुष्य तेरे (सारे) गुण नहीं जान सकता। जो मनुष्य (तेरे गुण) गाते हैं, वे विकारों से बच निकलते हैं। जो मनुष्य (तेरी सिफतें) सुनते हैं, उनके अनेकों पाप नाश हो जाते हैं।
हे भाई! परमात्मा पशु-स्वभाव लोगों को, और महामूर्खों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है, बड़े-बड़े कठोर-चिक्त मनुष्यों को भी पार लंघा देता है। हे नानक! (कह- हे प्रभू!) तेरे दास तेरी शरण पड़े रहते हैं और सदा ही तुझ पर से बलिहार जाते हैं।4।1।4।


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