अमृत वेले का हुक्मनामा – 05 मई 2026
अंग : 768
ੴ सतिगुर प्रसादि रागु सूही महला ३ घरु ३ भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥ सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥ हउमै सबदि जलाइआ मेरे हरि भाइआ जिस दी साची बाणी ॥ सची भगति करहि दिनु राती गुरमुखि आखि वखाणी ॥ भगता की चाल सची अति निरमल नामु सचा मनि भाइआ ॥ नानक भगत सोहहि दरि साचै जिनी सचो सचु कमाइआ ॥१॥ हरि भगता की जाति पति है भगत हरि कै नामि समाणे राम ॥ हरि भगति करहि विचहु आपु गवावहि जिन गुण अवगण पछाणे राम ॥ गुण अउगण पछाणै हरि नामु वखाणै भै भगति मीठी लागी ॥ अनदिनु भगति करहि दिनु राती घर ही महि बैरागी ॥ भगती राते सदा मनु निरमलु हरि जीउ वेखहि सदा नाले ॥ नानक से भगत हरि कै दरि साचे अनदिनु नामु सम्ह्हाले ॥२॥ मनमुख भगति करहि बिनु सतिगुर विणु सतिगुर भगति न होई राम ॥ हउमै माइआ रोगि विआपे मरि जनमहि दुखु होई राम ॥ मरि जनमहि दुखु होई दूजै भाइ परज विगोई विणु गुर ततु न जानिआ ॥ भगति विहूणा सभु जगु भरमिआ अंति गइआ पछुतानिआ ॥ कोटि मधे किनै पछाणिआ हरि नामा सचु सोई ॥ नानक नामि मिलै वडिआई दूजै भाइ पति खोई ॥३॥ भगता कै घरि कारजु साचा हरि गुण सदा वखाणे राम ॥ भगति खजाना आपे दीआ कालु कंटकु मारि समाणे राम ॥ कालु कंटकु मारि समाणे हरि मनि भाणे नामु निधानु सचु पाइआ ॥ सदा अखुटु कदे न निखुटै हरि दीआ सहजि सुभाइआ ॥ हरि जन ऊचे सद ही ऊचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥ नानक आपे बखसि मिलाए जुगि जुगि सोभा पाइआ ॥४॥१॥२॥
अर्थ: हे भाई ! परमात्मा अपने भक्तों की इज्ज़त रखता है, हरेक जुग में (भक्तों की) इज्ज़त रखता आया है। जो मनुख गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलता है, वह भगवान का भक्त बन जाता है, वह मनुख गुरु के शब्द में जुड़ के अपनी हऊमै दूर करता है। हे भाई ! जो मनुख गुरु के शब्द के द्वारा अपने अंदर से हऊमै जलाता है, वह उस परमात्मा को प्यारा लगता है जिस की सिफ़त-सालाह सदा अटल रहने वाली है। गुरु के सनमुख रहने वाले मनुख दिन रात परमात्मा की सदा-थिर रहने वाले भक्ति करते रहते हैं, वह आप सिफ़त-सालाह वाली बाणी उच्चारते रहते हैं, और ओरों को भी उस की सूझ देते हैं। हे भाई ! भक्तों की जीवन-जुगती सदा एक-रस रहने वाली और बड़ी पवित्र होती है, उन के मन में परमात्मा का सदा-थिर नाम प्यारा लगता रहता है। हे नानक ! परमात्मा के भक्त सदा-थिर परमात्मा के दर पर सुशोभित हैं, वह परमात्मा का सदा-थिर रहने वाला नाम ही सदा जपते रहते हैं।1। हे भाई! परमात्मा ही भक्तों के लिए (ऊँची) जाति है, परमात्मा ही उनकी इज्जत है। भक्त परमात्मा के नाम में ही लीन रहते हैं। भक्त (सदा) हरी की भक्ति करते हैं, अपने अंदर से स्वै भाव (भी) दूर कर लेते हैं, क्योंकि उन्होंने गुणों व अवगुणों की परख कर ली होती है (उनको पता होता है कि अहंकार अवगुण है)। जो मनुष्य गुण और अवगुण की परख कर लेता है, और परमात्मा का नाम उचारता रहता है, उसको प्रभू के डर-अदब में रहने के कारण प्रभू की भक्ति प्यारी लगती है। जो मनुष्य दिन-रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते हैं, वे गृहस्त में ही माया के मोह से निर्लिप रहते हैं। हे भाई! जो मनुष्य सदा प्रभू की भगती (के रंग) में रंगे रहते हैं, उनका मन पवित्र हो जाता है, वे परमात्मा को सदा अपने अंग-संग बसता देखते हैं। हे नानक! ऐसे भक्त हर वक्त प्रभू के नाम को अपने हृदय में बसा के परमात्मा के दर पर सुर्ख-रू हो जाते हैं।2। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गुरू की शरण पड़े बिना (अपनी ओर से ही) प्रभू की भक्ति करते हैं, पर गुरू की शरण पड़े बिना भक्ति नहीं हो सकती। वह मनुष्य अहंकार में, माया के रोग में, फंसे रहते हैं, आत्मिक मौत सहेड़ के वे जन्मों के चक्करों में पड़े रहते हैं, उन्हें दुख चिपका रहता है। हे भाई! माया के मोह में फस के दुनिया ख्वार होती है। गुरू की शरण पड़े बिना कोई भी अस्लियत को नहीं समझता। भक्ति से वंचित हुआ सारा जगत ही भटकता फिरता है, और, आखिर हाथ मलता (दुनिया से) जाता है। हे नानक! करोड़ों में से किसी विरले मनुष्य ने ये बात समझी है कि परमात्मा का नाम ही सदा कायम रहने वाला है, नाम में जुड़ने से ही (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है, और, माया के मोह में मनुष्य इज्जत गवा लेता है।3। परमात्मा के गुण सदा गाते रहने के कारण भक्तों के हृदय में ये आहर सदा बना रहता है। भक्ति का खजाना परमात्मा ने खुद ही अपने भक्तों को दिया हुआ है, (इसकी बरकति से वे) दुखद मौत के डर को समाप्त करके (परमात्मा में) लीन रहते हैं। दुखदाई मौत के डर को खत्म करके भक्त परमात्मा में लीन रहते हैं, परमात्मा के मन को प्यारे लगते हैं, (परमात्मा के पास से भक्त) सदा कायम रहने वाला नाम-खजाना प्राप्त कर लेते हैं। ये खजाना ना खत्म होने वाला है, कभी खत्म नहीं होता। परमात्मा ने उनको आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिके हुओं को ये खजाना दे दिया। (इस खजाने के सदका) भक्त सदा ही ऊँचे आत्मिक मण्डल में टिके रहते हैं, गुरू के शबद की बरकति से उनका जीवन सोहाना बन जाता है। हे नानक! परमात्मा खुद ही मेहर कर के उनको चरणों से जोड़े रखता है, हरेक युग में वे शोभा कमाते हैं।4।1।2।

