ਅੰਗ : 654

ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਭੈ ਮਤ ਸੁਨਿ ਕੈ ਕਰੀ ਕਰਮ ਕੀ ਆਸਾ ॥ ਕਾਲ ਗ੍ਰਸਤ ਸਭ ਲੋਗ ਸਿਆਨੇ ਉਠਿ ਪੰਡਿਤ ਪੈ ਚਲੇ ਨਿਰਾਸਾ ॥੧॥ ਮਨ ਰੇ ਸਰਿਓ ਨ ਏਕੈ ਕਾਜਾ ॥ ਭਜਿਓ ਨ ਰਘੁਪਤਿ ਰਾਜਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ ਬਨ ਖੰਡ ਜਾਇ ਜੋਗੁ ਤਪੁ ਕੀਨੋ ਕੰਦ ਮੂਲੁ ਚੁਨਿ ਖਾਇਆ ॥ ਨਾਦੀ ਬੇਦੀ ਸਬਦੀ ਮੋਨੀ ਜਮ ਕੇ ਪਟੈ ਲਿਖਾਇਆ ॥੨॥ ਭਗਤਿ ਨਾਰਦੀ ਰਿਦੈ ਨ ਆਈ ਕਾਛਿ ਕੂਛਿ ਤਨੁ ਦੀਨਾ ॥ ਰਾਗ ਰਾਗਨੀ ਡਿੰਭ ਹੋਇ ਬੈਠਾ ਉਨਿ ਹਰਿ ਪਹਿ ਕਿਆ ਲੀਨਾ ॥੩॥ ਪਰਿਓ ਕਾਲੁ ਸਭੈ ਜਗ ਊਪਰ ਮਾਹਿ ਲਿਖੇ ਭ੍ਰਮ ਗਿਆਨੀ ॥ ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਜਨ ਭਏ ਖਾਲਸੇ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਜਿਹ ਜਾਨੀ ॥੪॥੩॥

ਅਰਥ: ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਸਿਆਣੇ ਬੰਦਿਆਂ ਨੇ ਵੇਦ ਪੁਰਾਨ ਆਦਿਕਾਂ ਦੇ ਸਾਰੇ ਮਤ ਸੁਣ ਕੇ ਕਰਮ-ਕਾਂਡ ਦੀ ਆਸ ਰੱਖੀ, (ਇਹ ਆਸ ਰੱਖੀ ਕਿ ਕਰਮ-ਕਾਂਡ ਨਾਲ ਜੀਵਨ ਸੌਰੇਗਾ) ਉਹ ਸਾਰੇ (ਆਤਮਕ) ਮੌਤ ਵਿਚ ਹੀ ਗ੍ਰਸੇ ਰਹੇ। ਪੰਡਿਤ ਲੋਕ ਭੀ ਆਸ ਪੂਰੀ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਹੀ ਉੱਠ ਕੇ ਚਲੇ ਗਏ (ਜਗਤ ਤਿਆਗ ਗਏ) ॥੧॥ ਹੇ ਮਨ! ਤੈਥੋਂ ਇਹ ਇੱਕ ਕੰਮ ਭੀ (ਜੋ ਕਰਨ-ਜੋਗ ਸੀ) ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਿਆ, ਤੂੰ ਪ੍ਰਕਾਸ਼-ਰੂਪ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਭਜਨ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ॥ ਕਈ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਜੰਗਲਾਂ ਵਿਚ ਜਾ ਕੇ ਜੋਗ ਸਾਧੇ, ਤਪ ਕੀਤੇ, ਗਾਜਰ-ਮੂਲੀ ਆਦਿਕ ਚੁਣ ਖਾ ਕੇ ਗੁਜ਼ਾਰਾ ਕੀਤਾ; ਜੋਗੀ, ਕਰਮ-ਕਾਂਡੀ, ‘ਅਲੱਖ’ ਆਖਣ ਵਾਲੇ ਜੋਗੀ, ਮੋਨਧਾਰੀ-ਇਹ ਸਾਰੇ ਜਮ ਦੇ ਲੇਖੇ ਵਿਚ ਹੀ ਲਿਖੇ ਗਏ (ਭਾਵ, ਇਹਨਾਂ ਦੇ ਸਾਧਨ ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਬਚਾ ਨਹੀਂ ਸਕਦੇ) ॥੨॥ ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੇ ਸਰੀਰ ਉੱਤੇ ਤਾਂ (ਧਾਰਮਿਕ ਚਿੰਨ੍ਹ) ਚੱਕਰ ਆਦਿਕ ਲਾ ਲਏ ਹਨ, ਪਰ ਪ੍ਰੇਮਾ-ਭਗਤੀ ਉਸ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਪੈਦਾ ਨਹੀਂ ਹੋਈ, ਜੋ ਰਾਗ ਰਾਗਨੀਆਂ ਤਾਂ ਗਾਉਂਦਾ ਹੈ ਪਰ ਨਿਰਾ ਪਖੰਡ-ਮੂਰਤੀ ਹੀ ਬਣ ਬੈਠਾ ਹੈ, ਅਜਿਹੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਪਾਸੋਂ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦਾ।੩। ਸਾਰੇ ਜਗਤ ਉੱਤੇ ਕਾਲ ਦਾ ਸਹਿਮ ਪਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਭਰਮੀ ਗਿਆਨੀ ਭੀ ਉਸੇ ਹੀ ਲੇਖੇ ਵਿਚ ਲਿਖੇ ਗਏ ਹਨ (ਉਹ ਭੀ ਮੌਤ ਦੇ ਸਹਿਮ ਵਿਚ ਹੀ ਹਨ) । ਹੇ ਕਬੀਰ! ਆਖ-ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਮਨੁੱਖਾਂ ਨੇ ਪ੍ਰੇਮਾ-ਭਗਤੀ ਕਰਨੀ ਸਮਝ ਲਈ ਹੈ ਉਹ (ਮੌਤ ਦੇ ਸਹਿਮ ਤੋਂ) ਆਜ਼ਾਦ ਹੋ ਗਏ ਹਨ।੪।੩।

बेद पुरान सभै मत सुनि कै करी करम की आसा ॥ काल ग्रसत सभ लोग सिआने उठि पंडित पै चले निरासा ॥१॥ मन रे सरिओ न एकै काजा ॥ भजिओ न रघुपति राजा ॥१॥ रहाउ ॥ बन खंड जाइ जोगु तपु कीनो कंद मूलु चुनि खाइआ ॥ नादी बेदी सबदी मोनी जम के पटै लिखाइआ ॥२॥ भगति नारदी रिदै न आई काछि कूछि तनु दीना ॥ राग रागनी डि्मभ होइ बैठा उनि हरि पहि किआ लीना ॥३॥ परिओ कालु सभै जग ऊपर माहि लिखे भ्रम गिआनी ॥ कहु कबीर जन भए खालसे प्रेम भगति जिह जानी ॥४॥३॥

अर्थ :-जिन सयाने लोगों ने वेद पुरान आदि के सारे मत सुन के कर्म-काँड की आशा रखी, (यह आशा रखी कि कर्म-काँड के साथ जीवन संवरेगा), वह सारे (आत्मिक) मौत में ही ग्रसे रहे। पंडित लोक भी आशा पूरी होने के बिना ही उॅठ के चले गए (जगत त्याग गए)।1। हे मन ! तुमने प्रकाश-रूप परमात्मा का भजन नहीं किया, तेरे से यह एक काम भी (जो करने-योग्य था) नहीं हो सका।1।रहाउ। कई लोकों ने जंगलों में जा के योग साधे, तप किये, गाजर-मूली आदि चुन खा के गुजारा किया; योगी, कर्म-काँडी, ‘अलख’ कहने वाले योगी, मोनधारी-यह सारे यम के लेखे में ही लिखे गए (भावार्थ, इन के साधन मौत के डर से बचा नहीं सकते)।2। जिन मनुष्यों ने शरीर पर तो (धार्मिक चिन्ह) चक्र आदि लगा लिए हैं, पर प्रेमा-भक्ति उसके हृदय में पैदा नहीं हुई, राग-रागनियां तो गाता है पर निरी पाखण्ड की मूर्ति ही बना बैठा है, ऐसे मनुष्य को परमात्मा से कुछ नहीं मिलता।3। सारे जगत पर काल का सहम पड़ा हुआ है, भरमी-ज्ञानी भी उसी ही लेखे में लिखे गए हैं (वे भी मौत के सहम में ही हैं)। हे कबीर! कह– जिन मनुष्यों ने प्रेमा-भक्ति करनी समझ ली है वह (मौत के सहम से) आजाद हो गए हैं।4।3।

धनासरी महला १ ॥ जीवा तेरै नाइ मनि आनंदु है जीउ ॥ साचो साचा नाउ गुण गोविंदु है जीउ ॥ गुर गिआनु अपारा सिरजणहारा जिनि सिरजी तिनि गोई ॥ परवाणा आइआ हुकमि पठाइआ फेरि न सकै कोई ॥ आपे करि वेखै सिरि सिरि लेखै आपे सुरति बुझाई ॥ नानक साहिबु अगम अगोचरु जीवा सची नाई ॥१॥ तुम सरि अवरु न कोइ आइआ जाइसी जीउ ॥ हुकमी होइ निबेड़ु भरमु चुकाइसी जीउ ॥ गुरु भरमु चुकाए अकथु कहाए सच महि साचु समाणा ॥ आपि उपाए आपि समाए हुकमी हुकमु पछाणा ॥ सची वडिआई गुर ते पाई तू मनि अंति सखाई ॥ नानक साहिबु अवरु न दूजा नामि तेरै वडिआई ॥२॥ तू सचा सिरजणहारु अलख सिरंदिआ जीउ ॥ एकु साहिबु दुइ राह वाद वधंदिआ जीउ ॥ दुइ राह चलाए हुकमि सबाए जनमि मुआ संसारा ॥ नाम बिना नाही को बेली बिखु लादी सिरि भारा ॥ हुकमी आइआ हुकमु न बूझै हुकमि सवारणहारा ॥ नानक साहिबु सबदि सिञापै साचा सिरजणहारा ॥३॥ भगत सोहहि दरवारि सबदि सुहाइआ जीउ ॥ बोलहि अम्रित बाणि रसन रसाइआ जीउ ॥ रसन रसाए नामि तिसाए गुर कै सबदि विकाणे ॥ पारसि परसिऐ पारसु होए जा तेरै मनि भाणे ॥ अमरा पदु पाइआ आपु गवाइआ विरला गिआन वीचारी ॥ नानक भगत सोहनि दरि साचै साचे के वापारी ॥४॥ भूख पिआसो आथि किउ दरि जाइसा जीउ ॥ सतिगुर पूछउ जाइ नामु धिआइसा जीउ ॥ सचु नामु धिआई साचु चवाई गुरमुखि साचु पछाणा ॥ दीना नाथु दइआलु निरंजनु अनदिनु नामु वखाणा ॥ करणी कार धुरहु फुरमाई आपि मुआ मनु मारी ॥ नानक नामु महा रसु मीठा त्रिसना नामि निवारी ॥५॥२॥

अर्थ: हे प्रभू जी! तेरे नाम में (जुड़ कर) मेरे अंदर आतमिक जीवन पैदा होता है, मेरे मन में ख़ुश़ी पैदा होती है। हे भाई! परमात्मा का नाम सदा-थिर रहने वाला है, प्रभू गुणों (का ख़ज़ाना) है और धरती के जीवों के दिल की जानने वाला है। गुरू का बख़्श़ा ज्ञान बताता है कि सिरजनहार प्रभू बेअंत है, जिस ने यह सृष्टि पैदा की है, वही इस को नाश करता है। जब उस के हुक्म में भेजा हुआ (मौत का) निमंत्रण आता है तो कोई जीव (उस निमंत्रण को) मोड़ नहीं सकता। परमात्मा आप ही (जीवों को) पैदा कर के आप ही संभाल करता है, आप ही प्रत्येक जीव के सिर पर (उस के किए कार्य अनुसार) लेख लिखता है, आप ही (जीव को सही जीवन-मार्ग की) सूझ बख़्श़ता है। मालिक-प्रभू अपहुँच है, जीवों के ज्ञान-इंद्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती। हे नानक जी! (उस के द्वार पर अरदास करो, और कहो – हे प्रभू!) तेरी सदा कायम रहने वाली सिफ़त-सलाह कर के मेरे अंदर आतमिक जीवन पैदा होता है (मुझे अपनी सिफ़त-सलाह बख़्श़) ॥१॥ हे प्रभू जी! तेरे बराबर का अन्य कोई नहीं है, (अन्य जो भी जगत में) आया है, (वह यहाँ से आखिर) चला जाएगा (तूँ ही सदा कायम रहने वाला हैं)। जिस मनुष्य की भटकना (गुरू) दूर करता है, प्रभू के हुक्म अनुसार उस के जन्म मरण के चक्र खत्म हो जाते हैं। गुरू जिस की भटकना दूर करता है, उस से उस परमात्मा की सिफ़त-सलाह करवाता है जिस के गुण बताए नहीं जा सकते। वह मनुष्य सदा-थिर प्रभू (की याद) में रहता है, सदा-थिर प्रभू (उस के हृदय में) प्रगट हो जाता है। वह मनुष्य रज़ा के मालिक-प्रभू का हुक्म पहचान लेता है (और समझ लेता है कि) प्रभू आप ही पैदा करता है और आप ही (अपने में) लीन कर लेता है। हे प्रभू! जिस मनुष्य ने तेरी सिफ़त- सलाह (की दात) गुरू से प्राप्त कर लई है, तूँ उस के मन में आ वसता हैं और अंत समय भी उस का मित्र बनता हैं। हे नानक जी! मालिक-प्रभू सदा कायम रहने वाला है, उस जैसा अन्य कोई नहीं। (उस के द्वार पर अरदास करो और कहो-) हे प्रभू! तेरे नाम से जुड़ने से (लोग परलोग में) आदर मिलता है ॥२॥ हे अदृष्ट रचनहार! तूँ सदा-थिर रहने वाला हैं और सब जीवों को पैदा करने वाला हैं। एक सिरजणहार ही (सारे जगत का) मालिक है, उस ने (जन्म और मरण) के दो रास्ते चलाएं हैं। (उसी की रज़ा अनुसार जगत में) झगड़ों की वृद्धि होती है। दोनों रास्ते प्रभू ने ही चलाएं हैं, सभी जीव उसी के हुक्म में हैं, (उसी के हुक्म अनुसार) जगत जमता और मरता रहता है। (जीव नाम को भुला कर माया के मोह का) ज़हर-रूप बोझ अपने सिर पर इक्कठा करी जाता है, (और यह नहीं समझता कि) परमात्मा के नाम के बिना अन्य कोई भी साथी-मित्र नहीं बन सकता। जीव (परमात्मा के) हुक्म अनुसार (जगत में) आता है, (पर माया के मोह में फंस कर उस) हुक्म को समझता नहीं। प्रभू आप ही जीव को अपने हुक्म अनुसार (सही रास्ते पा कर) संवारने के समर्थ है। हे नानक जी! गुरू के श़ब्द में जुड़ने से यह पहचान आती है कि जगत का मालिक सदा-थिर रहने वाला है और सब का पैदा करने वाला है ॥३॥ हे भाई! परमात्मा की भगती करने वाले मनुष्य परमात्मा की हज़ूरी में शोभा प्राप्त करते हैं, क्योंकि गुरू के श़ब्द की बरकत से वह अपने जीवन को सुंदर बना लेते हैं। वह मनुष्य आतमिक जीवन देने वाली बाणी अपनी जीभ से उचारते रहते हैं, जीव को उस बाणी से एक-रस कर लेते हैं। भगत-जन प्रभू के नाम से जीभ को रसा लेते हैं, नाम में जुड़ कर (नाम के लिए उनकी) प्यास बढ़ती है, गुरू के श़ब्द द्वारा वह प्रभू-नाम से सदके होते हैं (नाम की खातिर अन्य सभी शारीरिक सुख कुर्बान करते हैं। हे प्रभू! जब (भगत जन) तेरे मन को प्यारे लगते हैं, तब वह गुरू-पारस से स्पर्श कर के आप भी पारस हो जाते हैं (अन्यों को पवित्र जीवन देने योग्य हो जाते हैं)। जो मनुष्य आपा-भाव दूर करते हैं उनको वह आतमिक दर्जा मिल जाता है जहाँ आतमिक मौत असर नहीं कर सकती। परन्तु इस तरह कोई विरला ही गुरू के दिए ज्ञान की विचार करने वाला मनुष्य होता है। हे नानक जी! परमात्मा की भगती करने वाले मनुष्य सदा-थिर प्रभू के द्वार पर शोभा प्राप्त करते हैं, वह (अपने सारे जीवन में) सदा-थिर प्रभू के नाम का ही व्यपार करते हैं ॥४॥ जब तक मैं माया के लिए भुखा प्यासा रहता हूँ, तब तक मैं किसी भी तरह प्रभू के द्वार पर पहुँच नहीं सकता। (माया की तृष्णा दूर करने का इलाज) मैं जा कर अपने गुरू से पुछता हूँ (और उन की शिक्षा के अनुसार) मैं परमात्मा का नाम सिमरता हूँ (नाम ही तृष्णा दूर करता है)। गुरू की श़रण पड़ कर मैं सदा-थिर नाम सिमरता हूँ, सदा-थिर प्रभू (की सिफ़त-सलाह) उचारता हूँ, और सदा-थिर प्रभू के साथ सांझ पाता हूँ। मैं हर रोज़ उस प्रभू का नाम मुख से लेता हूँ जो दीनों का सहारा है जो दया का स्रोत है और जिस पर माया का असर नहीं पड़ सकता। परमात्मा ने जिस मनुष्य को अपनी हज़ूरी से ही नाम सिमरन की करने-योग्य कार्य करने का हुक्म दे दिया, वह मनुष्य अपने मन को (माया की तरफ़ से) मार कर तृष्णा के असर से बच जाता है। हे नानक जी! उस मनुष्य को प्रभू का नाम ही मीठा और अन्य सभी रसों से श्रेष्ठ लगता है, उस ने नाम सिमरन की बरकत से माया की तृष्णा (अपने अंदर से) दूर कर ली होती है ॥५॥२॥

ਅੰਗ : 688

ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥ ਜੀਵਾ ਤੇਰੈ ਨਾਇ ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ਹੈ ਜੀਉ ॥ ਸਾਚੋ ਸਾਚਾ ਨਾਉ ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦੁ ਹੈ ਜੀਉ ॥ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਅਪਾਰਾ ਸਿਰਜਣਹਾਰਾ ਜਿਨਿ ਸਿਰਜੀ ਤਿਨਿ ਗੋਈ ॥ ਪਰਵਾਣਾ ਆਇਆ ਹੁਕਮਿ ਪਠਾਇਆ ਫੇਰਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਈ ॥ ਆਪੇ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਲੇਖੈ ਆਪੇ ਸੁਰਤਿ ਬੁਝਾਈ ॥ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬੁ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਜੀਵਾ ਸਚੀ ਨਾਈ ॥੧॥ ਤੁਮ ਸਰਿ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ਆਇਆ ਜਾਇਸੀ ਜੀਉ ॥ ਹੁਕਮੀ ਹੋਇ ਨਿਬੇੜੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਸੀ ਜੀਉ ॥ ਗੁਰੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ਅਕਥੁ ਕਹਾਏ ਸਚ ਮਹਿ ਸਾਚੁ ਸਮਾਣਾ ॥ ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਆਪਿ ਸਮਾਏ ਹੁਕਮੀ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਾ ॥ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ਤੂ ਮਨਿ ਅੰਤਿ ਸਖਾਈ ॥ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬੁ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਨਾਮਿ ਤੇਰੈ ਵਡਿਆਈ ॥੨॥ ਤੂ ਸਚਾ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ਅਲਖ ਸਿਰੰਦਿਆ ਜੀਉ ॥ ਏਕੁ ਸਾਹਿਬੁ ਦੁਇ ਰਾਹ ਵਾਦ ਵਧੰਦਿਆ ਜੀਉ ॥ ਦੁਇ ਰਾਹ ਚਲਾਏ ਹੁਕਮਿ ਸਬਾਏ ਜਨਮਿ ਮੁਆ ਸੰਸਾਰਾ ॥ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਾਹੀ ਕੋ ਬੇਲੀ ਬਿਖੁ ਲਾਦੀ ਸਿਰਿ ਭਾਰਾ ॥ ਹੁਕਮੀ ਆਇਆ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝੈ ਹੁਕਮਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬੁ ਸਬਦਿ ਸਿਞਾਪੈ ਸਾਚਾ ਸਿਰਜਣਹਾਰਾ ॥੩॥ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਦਰਵਾਰਿ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਇਆ ਜੀਉ ॥ ਬੋਲਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣਿ ਰਸਨ ਰਸਾਇਆ ਜੀਉ ॥ ਰਸਨ ਰਸਾਏ ਨਾਮਿ ਤਿਸਾਏ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵਿਕਾਣੇ ॥ ਪਾਰਸਿ ਪਰਸਿਐ ਪਾਰਸੁ ਹੋਏ ਜਾ ਤੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਣੇ ॥ ਅਮਰਾ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਆਪੁ ਗਵਾਇਆ ਵਿਰਲਾ ਗਿਆਨ ਵੀਚਾਰੀ ॥ ਨਾਨਕ ਭਗਤ ਸੋਹਨਿ ਦਰਿ ਸਾਚੈ ਸਾਚੇ ਕੇ ਵਾਪਾਰੀ ॥੪॥ ਭੂਖ ਪਿਆਸੋ ਆਥਿ ਕਿਉ ਦਰਿ ਜਾਇਸਾ ਜੀਉ ॥ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਛਉ ਜਾਇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਸਾ ਜੀਉ ॥ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਸਾਚੁ ਚਵਾਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣਾ ॥ ਦੀਨਾ ਨਾਥੁ ਦਇਆਲੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣਾ ॥ ਕਰਣੀ ਕਾਰ ਧੁਰਹੁ ਫੁਰਮਾਈ ਆਪਿ ਮੁਆ ਮਨੁ ਮਾਰੀ ॥ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਮੀਠਾ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨਾਮਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥੫॥੨॥

ਅਰਥ: ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ ਜੀ! ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਵਿਚ (ਜੁੜ ਕੇ) ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਮੇਰੇ ਮਨ ਵਿਚ ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਪ੍ਰਭੂ ਗੁਣਾਂ (ਦਾ ਖ਼ਜ਼ਾਨਾ) ਹੈ ਤੇ ਧਰਤੀ ਦੇ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਦਿਲ ਦੀ ਜਾਣਨ ਵਾਲਾ ਹੈ। ਗੁਰੂ ਦਾ ਬਖ਼ਸ਼ਿਆ ਗਿਆਨ ਦੱਸਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਿਰਜਣਹਾਰ ਪ੍ਰਭੂ ਬੇਅੰਤ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੇ ਇਹ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਪੈਦਾ ਕੀਤੀ ਹੈ, ਉਹੀ ਇਸ ਨੂੰ ਨਾਸ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਉਸ ਦੇ ਹੁਕਮ ਵਿਚ ਭੇਜਿਆ ਹੋਇਆ (ਮੌਤ ਦਾ) ਸੱਦਾ ਆਉਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਕੋਈ ਜੀਵ (ਉਸ ਸੱਦੇ ਨੂੰ) ਮੋੜ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ। ਪਰਮਾਤਮਾ ਆਪ ਹੀ (ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ) ਪੈਦਾ ਕਰ ਕੇ ਆਪ ਹੀ ਸੰਭਾਲ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ ਹਰੇਕ ਜੀਵ ਦੇ ਸਿਰ ਉਤੇ (ਉਸ ਦੇ ਕੀਤੇ ਕਰਮਾਂ ਅਨੁਸਾਰ) ਲੇਖ ਲਿਖਦਾ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ (ਜੀਵ ਨੂੰ ਸਹੀ ਜੀਵਨ-ਰਾਹ ਦੀ) ਸੂਝ ਬਖ਼ਸ਼ਦਾ ਹੈ। ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਅਪਹੁੰਚ ਹੈ, ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਗਿਆਨ-ਇੰਦ੍ਰਿਆਂ ਦੀ ਉਸ ਤਕ ਪਹੁੰਚ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! (ਉਸ ਦੇ ਦਰ ਤੇ ਅਰਦਾਸ ਕਰੋ, ਤੇ ਆਖੋ-ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ!) ਤੇਰੀ ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿਣ ਵਾਲੀ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ ਕਰ ਕੇ ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ (ਮੈਨੂੰ ਆਪਣੀ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ ਬਖ਼ਸ਼) ॥੧॥ ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ ਜੀ! ਤੇਰੇ ਬਰਾਬਰ ਦਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਹੈ, (ਹੋਰ ਜੇਹੜਾ ਭੀ ਜਗਤ ਵਿਚ) ਆਇਆ ਹੈ, (ਉਹ ਇਥੋਂ ਆਖ਼ਰ) ਚਲਾ ਜਾਇਗਾ (ਤੂੰ ਹੀ ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਹੈਂ)। ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਭਟਕਣਾ (ਗੁਰੂ) ਦੂਰ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਹੁਕਮ ਅਨੁਸਾਰ ਉਸ ਦੇ ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੇ ਗੇੜ ਦਾ ਖ਼ਾਤਮਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਗੁਰੂ ਜਿਸ ਦੀ ਭਟਕਣਾ ਦੂਰ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਪਾਸੋਂ ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ ਕਰਾਂਦਾ ਹੈ ਜਿਸ ਦੇ ਗੁਣ ਬਿਆਨ ਤੋਂ ਪਰੇ ਹਨ। ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਪ੍ਰਭੂ (ਦੀ ਯਾਦ) ਵਿਚ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਸਦਾ-ਥਿਰ ਪ੍ਰਭੂ (ਉਸ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ) ਪਰਗਟ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਰਜ਼ਾ ਦੇ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਹੁਕਮ ਪਛਾਣ ਲੈਂਦਾ ਹੈ (ਤੇ ਸਮਝ ਲੈਂਦਾ ਹੈ ਕਿ) ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਹੀ ਪੈਦਾ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਆਪ ਹੀ (ਆਪਣੇ ਵਿਚ) ਲੀਨ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੇ ਤੇਰੀ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ (ਦੀ ਦਾਤਿ) ਗੁਰੂ ਤੋਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲਈ ਹੈ, ਤੂੰ ਉਸ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਆ ਵੱਸਦਾ ਹੈਂ ਤੇ ਅੰਤ ਸਮੇ ਭੀ ਉਸ ਦਾ ਸਾਥੀ ਬਣਦਾ ਹੈਂ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਉਸ ਵਰਗਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਨਹੀਂ। (ਉਸ ਦੇ ਦਰ ਤੇ ਅਰਦਾਸ ਕਰੋ ਤੇ ਆਖੋ-) ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਵਿਚ ਜੁੜਿਆਂ (ਲੋਕ ਪਰਲੋਕ ਵਿਚ) ਆਦਰ ਮਿਲਦਾ ਹੈ ॥੨॥ ਹੇ ਅਦ੍ਰਿਸ਼ਟ ਰਚਨਹਾਰ! ਤੂੰ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਹੈਂ ਤੇ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦਾ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਹੈਂ। ਇਕੋ ਸਿਰਜਣਹਾਰ ਹੀ (ਸਾਰੇ ਜਗਤ ਦਾ) ਮਾਲਕ ਹੈ, ਉਸ ਨੇ (ਜੰਮਣਾ ਤੇ ਮਰਨਾ) ਦੋ ਰਸਤੇ ਚਲਾਏ ਹਨ। (ਉਸੇ ਦੀ ਰਜ਼ਾ ਅਨੁਸਾਰ ਜਗਤ ਵਿਚ) ਝਗੜੇ ਵਧਦੇ ਹਨ। ਦੋਵੇਂ ਰਸਤੇ ਪ੍ਰਭੂ ਨੇ ਹੀ ਤੋਰੇ ਹਨ, ਸਾਰੇ ਜੀਵ ਉਸੇ ਦੇ ਹੁਕਮ ਵਿਚ ਹਨ, (ਉਸੇ ਦੇ ਹੁਕਮ ਅਨੁਸਾਰ) ਜਗਤ ਜੰਮਦਾ ਤੇ ਮਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। (ਜੀਵ ਨਾਮ ਨੂੰ ਭੁਲਾ ਕੇ ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਦਾ) ਜ਼ਹਰ-ਰੂਪ ਭਾਰ ਆਪਣੇ ਸਿਰ ਉਤੇ ਇਕੱਠਾ ਕਰੀ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, (ਤੇ ਇਹ ਨਹੀਂ ਸਮਝਦਾ ਕਿ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਭੀ ਸਾਥੀ-ਮਿੱਤਰ ਨਹੀਂ ਬਣ ਸਕਦਾ। ਜੀਵ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ) ਹੁਕਮ ਅਨੁਸਾਰ (ਜਗਤ ਵਿਚ) ਆਉਂਦਾ ਹੈ, (ਪਰ ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਵਿਚ ਫਸ ਕੇ ਉਸ) ਹੁਕਮ ਨੂੰ ਸਮਝਦਾ ਨਹੀਂ। ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਹੀ ਜੀਵ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਹੁਕਮ ਅਨੁਸਾਰ (ਸਿੱਧੇ ਰਾਹ ਪਾ ਕੇ) ਸਵਾਰਨ ਦੇ ਸਮਰਥ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਵਿਚ ਜੁੜਿਆਂ ਇਹ ਪਛਾਣ ਆਉਂਦੀ ਹੈ ਕਿ ਜਗਤ ਦਾ ਮਾਲਕ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਹੈ ਤੇ ਸਭ ਦਾ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਹੈ ॥੩॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਭਗਤੀ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਬੰਦੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਹਜ਼ੂਰੀ ਵਿਚ ਸੋਭਦੇ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਉਹ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਸੋਹਣਾ ਬਣਾ ਲੈਂਦੇ ਹਨ। ਉਹ ਬੰਦੇ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੇਣ ਵਾਲੀ ਬਾਣੀ ਆਪਣੀ ਜੀਭ ਨਾਲ ਉਚਾਰਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਜੀਵ ਨੂੰ ਉਸ ਬਾਣੀ ਨਾਲ ਇਕ-ਰਸ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਹਨ। ਭਗਤ-ਜਨ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ ਨਾਲ ਜੀਭ ਨੂੰ ਰਸਾ ਲੈਂਦੇ ਹਨ, ਨਾਮ ਵਿਚ ਜੁੜ ਕੇ (ਨਾਮ ਵਾਸਤੇ ਉਹਨਾਂ ਦੀ) ਪਿਆਸ ਵਧਦੀ ਹੈ, ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ-ਨਾਮ ਤੋਂ ਸਦਕੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ (ਨਾਮ ਦੀ ਖ਼ਾਤਰ ਹੋਰ ਸਭ ਸਰੀਰਕ ਸੁਖ ਕੁਰਬਾਨ ਕਰਦੇ ਹਨ)। ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਜਦੋਂ (ਭਗਤ ਜਨ) ਤੇਰੇ ਮਨ ਵਿਚ ਪਿਆਰੇ ਲੱਗਦੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਉਹ ਗੁਰੂ-ਪਾਰਸ ਨਾਲ ਛੁਹ ਕੇ ਆਪ ਭੀ ਪਾਰਸ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ (ਹੋਰਨਾਂ ਨੂੰ ਪਵਿਤ੍ਰ ਜੀਵਨ ਦੇਣ ਜੋਗੇ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ)। ਜੇਹੜੇ ਬੰਦੇ ਆਪਾ-ਭਾਵ ਦੂਰ ਕਰਦੇ ਹਨ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਉਹ ਆਤਮਕ ਦਰਜਾ ਮਿਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਜਿਥੇ ਆਤਮਕ ਮੌਤ ਅਸਰ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੀ। ਪਰ ਅਜੇਹਾ ਕੋਈ ਵਿਰਲਾ ਹੀ ਗੁਰੂ ਦੇ ਦਿੱਤੇ ਗਿਆਨ ਦੀ ਵਿਚਾਰ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਬੰਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਭਗਤੀ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਬੰਦੇ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਦਰ ਤੇ ਸੋਭਾ ਪਾਂਦੇ ਹਨ, ਉਹ (ਆਪਣੇ ਸਾਰੇ ਜੀਵਨ ਵਿਚ) ਸਦਾ-ਥਿਰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਹੀ ਵਣਜ ਕਰਦੇ ਹਨ ॥੪॥ ਜਦੋਂ ਤਕ ਮੈਂ ਮਾਇਆ ਵਾਸਤੇ ਭੁੱਖਾ ਪਿਆਸਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹਾਂ, ਤਦ ਤਕ ਮੈਂ ਕਿਸੇ ਭੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਦਰ ਤੇ ਪਹੁੰਚ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ। (ਮਾਇਆ ਦੀ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੂਰ ਕਰਨ ਦਾ ਇਲਾਜ) ਮੈਂ ਜਾ ਕੇ ਆਪਣੇ ਗੁਰੂ ਤੋਂ ਪੁੱਛਦਾ ਹਾਂ (ਤੇ ਉਸ ਦੀ ਸਿੱਖਿਆ ਅਨੁਸਾਰ) ਮੈਂ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਦਾ ਹਾਂ (ਨਾਮ ਹੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਦੂਰ ਕਰਦਾ ਹੈ)। ਗੁਰੂ ਦੀ ਸਰਨ ਪੈ ਕੇ ਮੈਂ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਨਾਮ ਸਿਮਰਦਾ ਹਾਂ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਪ੍ਰਭੂ (ਦੀ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ) ਉਚਾਰਦਾ ਹਾਂ, ਤੇ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਲ ਸਾਂਝ ਪਾਂਦਾ ਹਾਂ। ਮੈਂ ਹਰ ਰੋਜ਼ ਉਸ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ ਮੂੰਹੋਂ ਬੋਲਦਾ ਹਾਂ ਜੋ ਦੀਨਾਂ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਹੈ ਜੋ ਦਇਆ ਦਾ ਸੋਮਾ ਹੈ ਤੇ ਜਿਸ ਉਤੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਨਹੀਂ ਪੈ ਸਕਦਾ। ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਹਜ਼ੂਰੀ ਤੋਂ ਹੀ ਨਾਮ ਸਿਮਰਨ ਦੀ ਕਰਨ-ਜੋਗ ਕਾਰ ਕਰਨ ਦਾ ਹੁਕਮ ਦੇ ਦਿੱਤਾ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ (ਮਾਇਆ ਵਲੋਂ) ਮਾਰ ਕੇ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੇ ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਬਚ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਉਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ ਹੀ ਮਿੱਠਾ* *ਤੇ ਹੋਰ ਸਭ ਰਸਾਂ ਨਾਲੋਂ ਸ੍ਰੇਸ਼ਟ ਲੱਗਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੇ ਨਾਮ ਸਿਮਰਨ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਮਾਇਆ ਦੀ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ (ਆਪਣੇ ਅੰਦਰੋਂ) ਦੂਰ ਕਰ ਲਈ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ॥੫॥੨॥

3 ਮਲਾਰ ਕੀ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੧
‘ਮਲਾਰ’ ਰਾਗ ਬਾਰੇ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੇ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਵਿਚ ਫੁਰਮਾਨ ਕੀਤਾ ਹੈ:
ਮਲਾਰੁ ਸੀਤਲ ਰਾਗੁ ਹੈ ਹਰਿ ਧਿਆਇਐ ਸਾਂਤਿ ਹੋਇ॥(ਪੰਨਾ 1283)
ਇਸ ਦੇ ਰੂਪ ਬਾਰੇ ਲਿਖਿਆ ਹੈ ਕਿ , ਮੂੰਹ ਵਿਚ ਪਾਠ ਤੇ ਚਮਕਦਾ ਚਿਹਰਾ ਅਤੇ ਚੜ੍ਹੀ ਜਵਾਨੀ ਜਿਸ ’ਤੇ ਚੰਦਨ ਮਲ-ਮਲ ਖੁਸ਼ਬੂ ਪੈਦਾ ਕੀਤੀ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਰੇਸ਼ਮੀ ਕੱਪੜੇ, ਭਾਵ ਸਾਰੇ ਪਾਸੇ ਉਤਸ਼ਾਹ ਦਾ ਵਾਤਾਵਰਨ। ਸੋ ‘ਰਾਗ ਮਲਾਰ’ ਵਿਚ ਬਾਣੀ ਦਾ ਮੀਂਹ ਪੈਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜਿਸ ਪੀ ਲਿਆ ਉਹ ਸ਼ਾਂਤ-ਚਿਤ ਹੋ ਗਿਆ:
ਸਾਚੀ ਬਾਣੀ ਮੀਠੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਧਾਰ॥
ਜਿਨਿ ਪੀਤੀ ਤਿਸੁ ਮੋਖ ਦੁਆਰ॥ (ਪੰਨਾ 1275)
ਇਹ ਵਾਰ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੀ ਉਚਾਰਨ ਕੀਤੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਇਸ ਵਾਰ ਦੀਆਂ ਕੁਲ 28 ਪਉੜੀਆਂ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ 1 ਪਉੜੀ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਦੀ ਉਚਾਰਨ ਕੀਤੀ ਹੋਈ ਹੈ ਅਤੇ ਬਾਕੀ ਦੀਆਂ 27 ਪਉੜੀਆਂ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਵਾਰ ਵਿਚ ਕੁਲ 58 ਸਲੋਕ ਸੰਕਲਿਤ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹਨ। ਇਸ ਵਾਰ ਵਿਚਲੀ ਹਰ ਪਉੜੀ ਅੱਠ-ਅੱਠ ਤੁਕਾਂ ਦੀ ਹੈ ਪਰ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਆਕਾਰ ਵਿਚ ਸਮਾਨਤਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਸ ਵਿਚ ਦਰਜ 58 ਸਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚੋਂ 24 ਸਲੋਕ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ, 5 ਸਲੋਕ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅੰਗਦ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ, 27 ਸਲੋਕ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਦੇ ਅਤੇ 2 ਸਲੋਕ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਦੇ ਹਨ। ਹਰ ਇਕ ਪਉੜੀ ਨਾਲ 2-2 ਸਲੋਕ ਹਨ, ਸਿਰਫ 21ਵੀਂ ਪਉੜੀ ਦੇ ਨਾਲ 4 ਸਲੋਕ ਹਨ। ਸਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਤੁਕਾਂ ਦਾ ਆਕਾਰ ਇਕਸਾਰ ਨਹੀਂ ਹੈ। 2 ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ 26 ਤਕ ਸਲੋਕ ਮਿਲਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਵਾਰ ਦੀਆਂ ਪਉੜੀਆਂ ਦੀ ਭਾਸ਼ਾ ਦਾ ਸਰੂਪ ਪੂਰਬੀ ਪੰਜਾਬੀ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਪਰ ਸਲੋਕ ਲਗਭਗ ਕੇਂਦਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਲਿਖੇ ਹੋਏ ਹਨ, ਭਾਵੇਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਉੁੱਪਰ ਕਿਤੇ-ਕਿਤੇ ਲਹਿੰਦੀ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਹੈ।
ਇਸ ਵਾਰ ਵਿਚ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਕੁਰੀਤੀਆਂ ਅਤੇ ਕੂੜ ਪਰੰਪਰਾਵਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ ਵਾਸਤਵਿਕ ਧਰਮ-ਕਾਰਜ ਵਿਚ ਲੀਨ ਹੋਣ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਗਟ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਕੁਝ ਵਿਦਵਾਨਾਂ ਨੇ ਇਸ ਦੀ ਭਾਵ-ਸਮੱਗਰੀ ਨੂੰ 4 ਭਾਗਾਂ ਵਿਚ ਵੰਡਿਆ ਹੈ। 1 ਤੋਂ 7 ਤਕ ਪਉੜੀਆਂ ਰੱਬ ਬਾਰੇ, 8 ਤੋਂ 16 ਤਕ ਨਾਮ ਬਾਰੇ, 17 ਤੋਂ 22 ਤਕ ਭਗਤੀ ਬਾਰੇ ਅਤੇ 23 ਤੋਂ 28 ਤਕ ਪਉੜੀਆਂ ਗੁਰੂ-ਸ਼ਬਦ ਬਾਰੇ ਹਨ। ਪਰ ਅਜਿਹੀ ਵੰਡ-ਰੇਖਾ ਅੰਦਰਲੇ ਤੱਥਾਂ ਤੋਂ ਸਪਸ਼ਟ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ।
4. ਗੂਜਰੀ ਕੀ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੩
‘ਗੂਜਰੀ’ ਇਕ ਪੁਰਾਤਨ ਰਾਗ ਹੈ। ਇਸ ਦਾ ਸੁਰਾਤਮਕ ਸਰੂਪ ਕਰੁਣਾ ਰਸ ਦਾ ਧਾਰਨੀ ਹੈ ਜਿਸ ਕਰਕੇ ਇਹ ਗੰਭੀਰ ਪ੍ਰਕਿਰਤੀ ਦੀਆਂ ਭਗਤੀ-ਭਾਵ ਵਾਲੀਆਂ ਰਚਨਾਵਾਂ ਦੇ ਗਾਇਨ ਲਈ ਅਤਿ ਢੁਕਵਾਂ ਹੈ। ‘ਰਾਗ ਗੂਜਰੀ’, ਤੋੜੀ ਦੀ ਵੰਨਗੀ ਹੈ, ਇਸੇ ਕਰਕੇ ਕਈ ਸੰਗੀਤ ਪ੍ਰੇਮੀ ਇਸ ਨੂੰ ‘ਗੂਜਰੀ ਤੋੜੀ’ ਵੀ ਆਖਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਵਾਰ ਵਿਚ ਕੁੱਲ 22 ਪਉੜੀਆਂ ਹਨ। ਇਹ ਸਾਰੀਆਂ ਪਉੜੀਆਂ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਦੀਆਂ ਉਚਾਰਨ ਕੀਤੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਹਨ। ਹਰ ਇਕ ਪਉੜੀ ਵਿਚ 5-5 ਤੁਕਾਂ ਹਨ। ਹਰ ਇਕ ਪਉੜੀ ਦੇ ਨਾਲ 2-2 ਸਲੋਕ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਕੇਵਲ ਚੌਥੀ ਪਉੜੀ ਨਾਲ ਆਇਆ ਸਲੋਕ ਭਗਤ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਬਾਕੀ ਸਾਰੇ ਸਲੋਕ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਦੇ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਤੁਕਾਂ ਵਿਚ ਸਮਾਨਤਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। 2 ਤੋਂ 11 ਤਕ ਤੁਕਾਂ ਮਿਲਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਵਾਰ ਦੀ ਭਾਸ਼ਾ ਸਾਧ-ਭਾਖਾ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਪੂਰਬੀ ਪੰਜਾਬੀ ਹੈ। ਪਉੜੀਆਂ ਅਤੇ ਸਲੋਕਾਂ ਵਿਚ ਭਾਵਗਤ ਸਮਾਨਤਾ ਹੈ।
ਇਸ ਵਾਰ ਵਿਚ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੇ ਫ਼ੁਰਮਾਇਆ ਹੈ ਕਿ ਪਰਮਾਤਮਾ ਜਗਤ ਦਾ ਸਿਰਜਨਹਾਰ ਹੈ। ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਮਿਹਰ ਨਾਲ ਗੁਰੂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ:
ਪ੍ਰਭ ਪਾਸਿ ਜਨ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਤੂ ਸਚਾ ਸਾਂਈ॥
ਤੂ ਰਖਵਾਲਾ ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਉ ਤੁਧੁ ਧਿਆਈ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤੇਰਿਆ ਤੂ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ॥
ਜੋ ਦਾਸ ਤੇਰੇ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਕਰੇ ਤਿਸੁ ਮਾਰਿ ਪਚਾਈ॥
ਚਿੰਤਾ ਛਡਿ ਅਚਿੰਤੁ ਰਹੁ ਨਾਨਕ ਲਗਿ ਪਾਈ॥ (ਪੰਨਾ 517 )
( ਚਲਦਾ )

सोरठि महला ५ ॥ गुरु पूरा भेटिओ वडभागी मनहि भइआ परगासा ॥ कोइ न पहुचनहारा दूजा अपुने साहिब का भरवासा ॥१॥ अपुने सतिगुर कै बलिहारै ॥ आगै सुखु पाछै सुख सहजा घरि आनंदु हमारै ॥ रहाउ ॥ अंतरजामी करणैहारा सोई खसमु हमारा ॥ निरभउ भए गुर चरणी लागे इक राम नाम आधारा ॥२॥

हे भाई! बड़ी किस्मत से मुझे पूरा गुरु मिल गया है, मेरे मन में आत्मिक जीवन की सूझ पैदा हो गयी है। अब मुझे अपने मालिक का सहारा हो गया है, कोई उस मालिक की बराबरी नहीं कर सकता।१। हे भाई! में अपने गुरु से कुर्बान जाता हूँ, (गुरु की कृपा से) मेरे हिर्दय-घर में आनंद बना रहता है, इस लोक में भी आत्मिक अडोलता का सुख मुझे प्राप्त हो गया है, और, परलोक में भी यह सुख सथिर रहने वाला है।रहाउ। हे भाई! जब से में गुरु की शरण आया हूँ, मुझे परमात्मा के नाम का सहारा हो गया है, कोई भय अब मुझे छु नहीं सकता (मुझे निश्चय हो गया है की जो) सिरजनहार सब के दिल की जानने वाला है वो ही मेरे सिर ऊपर रखवाला है।२।

ਅੰਗ : 609

ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਓ ਵਡਭਾਗੀ ਮਨਹਿ ਭਇਆ ਪਰਗਾਸਾ ॥ ਕੋਇ ਨ ਪਹੁਚਨਹਾਰਾ ਦੂਜਾ ਅਪੁਨੇ ਸਾਹਿਬ ਕਾ ਭਰਵਾਸਾ ॥੧॥ ਅਪੁਨੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰੈ ॥ ਆਗੈ ਸੁਖੁ ਪਾਛੈ ਸੁਖ ਸਹਜਾ ਘਰਿ ਆਨੰਦੁ ਹਮਾਰੈ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਕਰਣੈਹਾਰਾ ਸੋਈ ਖਸਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥ ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਲਾਗੇ ਇਕ ਰਾਮ ਨਾਮ ਆਧਾਰਾ ॥੨॥

ਅਰਥ: ਹੇ ਭਾਈ! ਵੱਡੀ ਕਿਸਮਤਿ ਨਾਲ ਮੈਨੂੰ ਪੂਰਾ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪਿਆ ਹੈ, ਮੇਰੇ ਮਨ ਵਿਚ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੀ ਸੂਝ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਈ ਹੈ। ਹੁਣ ਮੈਨੂੰ ਆਪਣੇ ਮਾਲਕ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, ਕੋਈ ਉਸ ਮਾਲਕ ਦੀ ਬਰਾਬਰੀ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ।੧। ਹੇ ਭਾਈ! ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਗੁਰੂ ਤੋਂ ਕੁਰਬਾਨ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ, (ਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ) ਮੇਰੇ ਹਿਰਦੇ-ਘਰ ਵਿਚ ਆਨੰਦ ਬਣਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਇਸ ਲੋਕ ਵਿਚ ਭੀ ਆਤਮਕ ਅਡੋਲਤਾ ਦਾ ਸੁਖ ਮੈਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, ਤੇ, ਪਰਲੋਕ ਵਿਚ ਭੀ ਇਹ ਸੁਖ ਟਿਕਿਆ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਹੈ।ਰਹਾਉ। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਦੋਂ ਦਾ ਮੈਂ ਗੁਰੂ ਦੀ ਚਰਨੀਂ ਲੱਗਾ ਹਾਂ, ਮੈਨੂੰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਆਸਰਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, ਕੋਈ ਡਰ ਮੈਨੂੰ ਹੁਣ ਪੋਹ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ (ਮੈਨੂੰ ਨਿਸ਼ਚਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ ਕਿ ਜੇਹੜਾ) ਸਿਰਜਣਹਾਰ ਸਭ ਦੇ ਦਿਲ ਦੀ ਜਾਣਨ ਵਾਲਾ ਹੈ ਉਹੀ ਮੇਰੇ ਸਿਰ ਉਤੇ ਰਾਖਾ ਹੈ।੨।

वडहंसु महला ५ ॥ साधसंगि हरि अंमरितु पीजै ॥ ना जीउ मरै न कबहू छीजै ॥१॥ वडभागी गुरु पूरा पाईऐ ॥ गुर किरपा ते प्रभू धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥ रतन जवाहर हरि माणक लाला ॥ सिमरि सिमरि प्रभ भए निहाला ॥२॥ जत कत पेखउ साधू सरणा ॥ हरि गुण गाइ निरमल मनु करणा ॥३॥ घट घट अंतरि मेरा सुआमी वूठा ॥ नानक नामु पाइआ प्रभु तूठा ॥४॥६॥

अर्थ :-हे भाई ! पूरा गुरु बड़ी किस्मत के साथ मिलता है, और, गुरु की कृपा के साथ परमात्मा का सुमिरन किया जा सकता है।1।रहाउ। हे भाई ! गुरु की संगत में ही आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जल पीया जा सकता है, (इस नाम-जल की बरकत के साथ) जीव ना आत्मिक मौत मरती है, ना कभी आत्मिक जीवन में कच्ची होती है।1। हे भाई ! परमात्मा की सिफ़त-सालाह के बचन (मानो) रतन हैं, जवाहर हैं, मोती हैं, लाल हैं। भगवान जी का नाम सिमर सिमर के सदा खिले रहते है।2। हे भाई ! मैं जिधर किधर देखता हूँ, गुरु की शरण ही (एक ऐसी जगह है जहाँ) परमात्मा की सिफ़त-सालाह के गीत गा गा के मन को पवित्र किया जा सकता है।3। हे नानक ! (बोल-) मेरा स्वामी-भगवान (वैसे तो) हरेक शरीर में बसता है (पर जिस मनुख के ऊपर वह) भगवान प्रसन्न होता है (वही उस का) नाम (-सुमिरन) प्राप्त करता है।4।6।

ਅੰਗ : 563

ਵਡਹੰਸੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥ ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ॥ ਨਾ ਜੀਉ ਮਰੈ ਨ ਕਬਹੂ ਛੀਜੈ ॥੧॥ ਵਡਭਾਗੀ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਈਐ ॥ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਪ੍ਰਭੂ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ ਰਤਨ ਜਵਾਹਰ ਹਰਿ ਮਾਣਕ ਲਾਲਾ ॥ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਨਿਹਾਲਾ ॥੨॥ ਜਤ ਕਤ ਪੇਖਉ ਸਾਧੂ ਸਰਣਾ ॥ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ਨਿਰਮਲ ਮਨੁ ਕਰਣਾ ॥੩॥ ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ਵੂਠਾ ॥ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਪਾਇਆ ਪ੍ਰਭੁ ਤੂਠਾ ॥੪॥੬॥

ਅਰਥ: ਹੇ ਭਾਈ! ਪੂਰਾ ਗੁਰੂ ਵੱਡੀ ਕਿਸਮਤਿ ਨਾਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ, ਤੇ, ਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਸਿਮਰਨ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।1। ਰਹਾਉ। ਹੇ ਭਾਈ! ਗੁਰੂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ ਹੀ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਹਰਿ-ਨਾਮ ਜਲ ਪੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, (ਇਸ ਨਾਮ-ਜਲ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ) ਜਿੰਦ ਨਾਹ ਆਤਮਕ ਮੌਤੇ ਮਰਦੀ ਹੈ, ਨਾਹ ਕਦੇ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਵਿਚ ਲਿੱਸੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।1। ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੇ ਬਚਨ (ਮਾਨੋ) ਰਤਨ ਹਨ, ਜਵਾਹਰ ਹਨ, ਮੋਤੀ ਹਨ, ਲਾਲ ਹਨ। ਪ੍ਰਭੂ ਜੀ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰ ਸਿਮਰ ਕੇ ਸਦਾ ਖਿੜੇ ਰਹੀਦਾ ਹੈ।2। ਹੇ ਭਾਈ! ਮੈਂ ਜਿਧਰ ਕਿਧਰ ਵੇਖਦਾ ਹਾਂ, ਗੁਰੂ ਦੀ ਸਰਨ ਹੀ (ਇਕ ਐਸਾ ਥਾਂ ਹੈ ਜਿਥੇ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੇ ਗੀਤ ਗਾ ਗਾ ਕੇ ਮਨ ਨੂੰ ਪਵਿਤ੍ਰ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।3। ਹੇ ਨਾਨਕ! (ਆਖ—) ਮੇਰਾ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ (ਉਂਞ ਤਾਂ) ਹਰੇਕ ਸਰੀਰ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਹੈ (ਪਰ ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਉੱਤੇ ਉਹ) ਪ੍ਰਭੂ ਪ੍ਰਸੰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ (ਉਹੀ ਉਸ ਦਾ) ਨਾਮ (-ਸਿਮਰਨ) ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।4।6।

धनासरी महला १ घरु १ चउपदे ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥ जीउ डरतु है आपणा कै सिउ करी पुकार ॥ दूख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ॥१॥ साहिबु मेरा नीत नवा सदा सदा दातारु ॥१॥ रहाउ ॥ अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ ॥ सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ ॥२॥ दइआल तेरै नामि तरा ॥ सद कुरबाणै जाउ ॥१॥ रहाउ ॥ सरबं साचा एकु है दूजा नाही कोइ ॥ ता की सेवा सो करे जा कउ नदरि करे ॥३॥ तुधु बाझु पिआरे केव रहा ॥ सा वडिआई देहि जितु नामि तेरे लागि रहां ॥ दूजा नाही कोइ जिसु आगै पिआरे जाइ कहा ॥१॥ रहाउ ॥ सेवी साहिबु आपणा अवरु न जाचंउ कोइ ॥ नानकु ता का दासु है बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥४॥ साहिब तेरे नाम विटहु बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥१॥ रहाउ ॥४॥१॥

अर्थ: राग धनासरी ,घर १ मे गुरू नानक देव जी की चार-बँदों वाली बाणी। अकाल पुरख एक है, जिस का नाम सच्चा है जो सिृसटी का रचनहार है, जो सब में मौजूद है, डर से रहित है, वैर रहित है, जिस का सरूप काल से परे है, (मतलब जिस का शरीर नाश रहित है), जो जूनों में नही आता, जिस का प्रकाश अपने अाप से हुआ है और जो सतिगुरू की कृपा से मिलता है। (जगत दुखों का समुँद्र है, इन दुखों को देख कर) मेरी जिंद काँप जाती है (परमात्मा के बिना अन्य कोई बचाने वाला नहीं दिखता) जिस के पास जा कर मैं अरजोई-अरदास करूँ। (इस लिए ओर आसरे छोड़ कर) मैं दुखों को नाश करने वाले प्रभू को ही सिमरता हूँ, वह सदा ही मेहर करने वाला है ॥१॥ (फिर वह) मेरा मालिक सदा ही बख्श़श़ें तो करता रहता है (परन्तु वह मेरी रोज की बेनती सुन के बख्श़श़ें करने में कभी परेशान नहीं होता) रोज ऐसे है जैसे पहली बार अपनी मेहर करने लगा है ॥१॥ रहाउ ॥ हे मेरी जिन्दे! हर रोज उस मालिक को याद करना चाहिए (दुखों से) आखिर वही बचाता है। हे मेरी जिन्दे! ध्यान से सुन (उस मालिक का सहारा लेने से ही दुखों से समुँद्र से) पार निकला जा सकता है ॥२॥ हे दयाल प्रभू! (मेहर कर, अपना नाम दे, जो कि) तेरे नाम से मैं (दुखों के इस समुँद्र को) पार कर सकूँ। मैं आपसे सदा सदके जाता हूँ ॥१॥ रहाउ ॥ सदा के लिए रहने वाला परमात्मा ही सब जगह हाज़िर है, उस के बिना ओर कोई नही। जिस जीव पर वह मेहर की निगाह करता है, वह उस का सिमरन करता है ॥३॥ हे प्यारे (प्रभू!) तेरी याद के बिना मे परेशान हो जाता हूँ। मुझे कोई वह बड़ी दात दें, जिस करके मैं तुम्हारे नाम मे जुड़ा रहा। हे प्यारे! तुम्हारे बिना ओर एेसा कोई नही है, जिस पास जा कर मैं यह अरजोई कर सका ॥१॥ रहाउ ॥ (दुखों के इस सागर से तरने के लिए) मैं अपने मालिक प्रभू को ही याद करता हूँ, किसी ओर से मैं यह माँग नही माँगता। नानक जी (अपने) उस (मालिक) का ही सेवक है, उस मालिक से ही खिन खिन सदके जाता है ॥४॥ हे मेरे मालिक! मैं तेरे नाम से खिन खिन कुर्बान जाता हूँ ॥१॥ रहाउ ॥४॥१॥

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