ਪਰਮਾਤਮਾ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਕੁਝ ਨਹੀਂ
ਪਰਮਾਤਮਾ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਕੁਝ ਨਹੀਂ
सलोक ॥ संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥ निरमलं संत संगेण ओट नानक परमेसुरह ॥१॥ चंदन चंदु न सरद रुति मूलि न मिटई घांम ॥ सीतलु थीवै नानका जपंदड़ो हरि नामु ॥२॥ पउड़ी ॥ चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥ सुणि परतापु गोविंद निरभउ भए मन ॥ तोटि न आवै मूलि संचिआ नामु धन ॥ संत जना सिउ संगु पाईऐ वडै पुन ॥ आठ पहर हरि धिआइ हरि जसु नित सुन ॥१७॥
अर्थ: जो संत जन गोपाल प्रभू के कीर्तन को अपने जीवन का सहारा बना लेते हैं, दयाल प्रभू उन संतों को (माया की तपस से) बचा लेता है, उन संतों की संगति करने से पवित्र हो जाते हैं। हे नानक! (तू भी ऐसे गुरमुखों की संगति में रह के) परमेश्वर का पल्ला पकड़।1। चाहे चंदन (का लेप किया) हो चाहे चंद्रमा (की चाँदनी) हो, और चाहे ठंडी ऋतु हो – इनसे मन की तपस बिल्कुल भी समाप्त नहीं हो सकती। हे नानक! प्रभू का नाम सिमरने से ही मनुष्य (का मन) शांत होता है।2। प्रभू के सुंदर चरणों का आसरा ले के सारे जीव (दुनिया की तपस से) बच जाते हैं। गोबिंद की महिमा सुन के (बँदगी वालों के) मन निडर हो जाते हैं। वे प्रभू का नाम-धन इकट्ठा करते हैं और उस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। ऐसे गुरमुखों की संगति बड़े भाग्यों से मिलती है, ये संत जन आठों पहर प्रभू को सिमरते हैं और सदा प्रभू का यश सुनते हैं।17।
ਅੰਗ : 709
ਸਲੋਕ ॥ ਸੰਤ ਉਧਰਣ ਦਇਆਲੰ ਆਸਰੰ ਗੋਪਾਲ ਕੀਰਤਨਹ ॥ ਨਿਰਮਲੰ ਸੰਤ ਸੰਗੇਣ ਓਟ ਨਾਨਕ ਪਰਮੇਸੁਰਹ ॥੧॥ ਚੰਦਨ ਚੰਦੁ ਨ ਸਰਦ ਰੁਤਿ ਮੂਲਿ ਨ ਮਿਟਈ ਘਾਂਮ ॥ ਸੀਤਲੁ ਥੀਵੈ ਨਾਨਕਾ ਜਪੰਦੜੋ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਚਰਨ ਕਮਲ ਕੀ ਓਟ ਉਧਰੇ ਸਗਲ ਜਨ ॥ ਸੁਣਿ ਪਰਤਾਪੁ ਗੋਵਿੰਦ ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਮਨ ॥ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਮੂਲਿ ਸੰਚਿਆ ਨਾਮੁ ਧਨ ॥ ਸੰਤ ਜਨਾ ਸਿਉ ਸੰਗੁ ਪਾਈਐ ਵਡੈ ਪੁਨ ॥ ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਧਿਆਇ ਹਰਿ ਜਸੁ ਨਿਤ ਸੁਨ ॥੧੭॥
ਅਰਥ: ਸਲੋਕ ॥ ਜੋ ਸੰਤ ਜਨ ਗੋਪਾਲ-ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਕੀਰਤਨ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਬਣਾ ਲੈਂਦੇ ਹਨ, ਦਿਆਲ ਪ੍ਰਭੂ ਉਹਨਾਂ ਸੰਤਾਂ ਨੂੰ (ਮਾਇਆ ਦੀ ਤਪਸ਼ ਤੋਂ) ਬਚਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਸੰਤਾਂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਕੀਤਿਆਂ ਪਵਿਤ੍ਰ ਹੋ ਜਾਈਦਾ ਹੈ । ਹੇ ਨਾਨਕ! (ਤੂੰ ਭੀ ਅਜੇਹੇ ਗੁਰਮੁਖਾਂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ ਰਹਿ ਕੇ) ਪਰਮੇਸਰ ਦਾ ਪੱਲਾ ਫੜ ।੧। ਭਾਵੇਂ ਚੰਦਨ (ਦਾ ਲੇਪ ਕੀਤਾ) ਹੋਵੇ ਚਾਹੇ ਚੰਦ੍ਰਮਾ (ਦੀ ਚਾਨਣੀ) ਹੋਵੇ, ਤੇ ਭਾਵੇਂ ਠੰਢੀ ਰੁੱਤ ਹੋਵੇ—ਇਹਨਾਂ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਮਨ ਦੀ ਤਪਸ਼ ਉੱਕਾ ਹੀ ਮਿਟ ਨਹੀਂ ਸਕਦੀ । ਹੇ ਨਾਨਕ! ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਿਆਂ ਹੀ ਮਨੁੱਖ (ਦਾ ਮਨ) ਸ਼ਾਂਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ।੨। ਪਉੜੀ ॥ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਸੋਹਣੇ ਚਰਨਾਂ ਦਾ ਆਸਰਾ ਲੈ ਕੇ ਸਾਰੇ ਜੀਵ (ਦੁਨੀਆ ਦੀ ਤਪਸ਼ ਤੋਂ) ਬਚ ਜਾਂਦੇ ਹਨ । ਗੋਬਿੰਦ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ਸੁਣ ਕੇ (ਬੰਦਗੀ ਵਾਲਿਆਂ ਦੇ) ਮਨ ਨਿਡਰ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ । ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ-ਧਨ ਇਕੱਠਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਉਸ ਧਨ ਵਿਚ ਕਦੇ ਘਾਟਾ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦਾ । ਅਜੇਹੇ ਗੁਰਮੁਖਾਂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਬੜੇ ਭਾਗਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲਦੀ ਹੈ, ਇਹ ਸੰਤ ਜਨ ਅੱਠੇ ਪਹਿਰ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਸਿਮਰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਜਸ ਸੁਣਦੇ ਹਨ ।੧੭।
धनासरी महला ५ ॥ जिस का तनु मनु धनु सभु तिस का सोई सुघड़ु सुजानी ॥ तिन ही सुणिआ दुखु सुखु मेरा तउ बिधि नीकी खटानी ॥१॥ जीअ की एकै ही पहि मानी ॥ अवरि जतन करि रहे बहुतेरे तिन तिलु नही कीमति जानी ॥ रहाउ ॥ अम्रित नामु निरमोलकु हीरा गुरि दीनो मंतानी ॥ डिगै न डोलै द्रिड़ु करि रहिओ पूरन होइ त्रिपतानी ॥२॥ ओइ जु बीच हम तुम कछु होते तिन की बात बिलानी ॥ अलंकार मिलि थैली होई है ता ते कनिक वखानी ॥३॥ प्रगटिओ जोति सहज सुख सोभा बाजे अनहत बानी ॥ कहु नानक निहचल घरु बाधिओ गुरि कीओ बंधानी ॥४॥५॥
अर्थ: हे भाई! जिस प्रभू का दिया हुआ यह शरीर और मन है, यह सारा धन-पदार्थ भी उसी का दिया हुआ है, वही सुशील और स्याना है। हम जीवों का दुःख सुख (सदा) उस परमात्मा ने ही सुना है, (जब वह हमारी अरदास-अरजोई सुनता है) तभी (हमारी) हालत अच्छी बन जाती है ॥१॥ हे भाई! जिंद की (अरदास) एक परमात्मा के पास ही मानी जाती है। (परमात्मा के सहारे के बिना लोग) अन्य बहुत यत्न कर के थक जाते हैं, उन यत्नों का मुल्य एक तिल जितना भी नहीं समझा जाता ॥ रहाउ ॥ हे भाई! परमात्मा का नाम आतमिक जीवन देने वाला है, नाम एक ऐसा हीरा है जो किसी मूल्य से नहीं मिल सकता। गुरू ने यह नाम मन्त्र (जिस मनुष्य को) दे दिया, वह मनुष्य (विकारों में) गिरता नहीं, डोलता नहीं, वह मनुष्य पक्के इरादे वाला बन जाता है, वह मुकम्मल तौर पर (माया की तरफ से) संतोखी रहता है ॥२॥ (हे भाई! जिस मनुष्य को गुरू पासों नाम-हीरा मिल जाता है, उस के अंदरों) उन्हा मेर-तेर वाले सभी वितकरों की बात मुक जाती है जो जगत में बड़े पर्बल हैं। (उस मनुष्य को हर तरफ परमात्मा ही इस तरह दिखता है, जैसे) अनेकों गहनें मिल कर (गाले जा कर) रैणी बन जाती है, और, उस ढेली से वह सोना ही कहलाती है ॥३॥ (हे भाई! जिस मनुष्य के अंदर गुरू की कृपा से) परमात्मा की ज्योत का प्रकाश हो जाता है, उस के अंदर आतमिक अडोलता के आनंद पैदा हो जाते हैं, उस को हर जगह शोभा मिलती है, उस के हिरदे में सिफत-सलाह की बाणी के (मानों) एक-रस वाजे वजते रहते हैं। नानक जी कहते हैं – गुरू ने जिस मनुष्य के लिए यह प्रबंध कर दिया, वह मनुष्य सदा के लिए प्रभू-चरनों में टिकाणा प्राप्त कर लेता है ॥४॥५॥

