अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 22 सितंबर 2026

अंग : 957
सलोक मः ५ ॥ भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुट्मबै नालि ॥ कारज आपि सवारिअनु सो प्रभ सदा सभालि ॥ प्रभु मात पिता कंठि लाइदा लहुड़े बालक पालि ॥ दइआल होए सभ जीअ जंत्र हरि नानक नदरि निहाल ॥१॥ मः ५ ॥ विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥ देहि नामु संतोखीआ उतरै मन की भुख ॥ गुरि वणु तिणु हरिआ कीतिआ नानक किआ मनुख ॥२॥ पउड़ी ॥ सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥ घड़ी न मुहतु चसा तिसु बिनु ना सरै ॥ अंतरि बाहरि संगि किआ को लुकि करै ॥ जिसु पति रखै आपि सो भवजलु तरै ॥ भगतु गिआनी तपा जिसु किरपा करै ॥ सो पूरा परधानु जिस नो बलु धरै ॥ जिसहि जराए आपि सोई अजरु जरै ॥ तिस ही मिलिआ सचु मंत्रु गुर मनि धरै ॥३॥
अर्थ: ( हे मन!) उस प्रभू को सदा याद कर जो तेरे सारे काम आप सवाँरता है, जो तुझे दुखों से खलासी देता है और तेरे सारे परिवार समेत तेरी रक्षा करता है। माता-पिता की तरह अंजाने बालकों को पाल के प्रभू (जीवों को) गले से लगाता है। हे नानक! जिस मनुष्य की ओर प्रभू मेहर की निगाह से देखता है, उस पर सब जीव दयालु हो जाते हैं।1। हे प्रभू! तेरे नाम के बिना (तुझसे) कुछ और माँगना भारी दुख सहने के तुल्य है; (हे प्रभू!) मुझे अपना नाम दे ता कि मुझे संतोख आ जाए और मेरे मन की तृष्णा समाप्त हो जाए। हे नानक! जिस गुरू ने जंगल और (जंगल की सूखी) घास हरी कर दी, मनुष्य को हरा करना उसके लिए कौन सी बड़ी बात है?।2। ऐसी दातें देने वाला प्रभू मन से भूलना नहीं चाहिए, (क्योंकि) उसके बिना (उसको भुला के, जिंदगी की) घड़ी दो घड़ियाँ पल आदि (थोड़ा भी समय) आसान नहीं गुजरता। प्रभू जीव के (सदा) अंदर (बसता है,) उसके बाहर (चौगिर्दे भी) मौजूद है, कोई जीव कोई काम उससे लुका-छिपा के नहीं कर सकता। वही मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघता है (संसार के विकारों से बचता है) जिसकी इज्जत की रक्षा प्रभू स्वयं करता है। वही भगत है, वही ज्ञानवान है, वही तपस्वी है, जिस पर प्रभू मेहर करता है। जिसको (विकारों का मुकाबला करने के लिए) प्रभू (आत्मिक) ताकत बख्शता है, उसकी कमाई सफल हो जाती है, वह आदर पाता है। (वैसे मानसिक ताकत भी एक ऐसी अवस्था है जिसकी प्राप्ति पर संभलने की बहुत आवश्यक्ता होती है, आम तौर पर मनुष्य रिद्धियों-सिद्धियों की ओर पलट जाता है) इस डाँवाडोल करने वाली अवस्था में वही मनुष्य संभलता है, जिसको प्रभू स्वयं संभलने की सहायता दे। जो मनुष्य गुरू का उपदेश हृदय में टिकाता है, उसको सदा-स्थिर प्रभू मिलता है।3।


Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Begin typing your search term above and press enter to search. Press ESC to cancel.

Back To Top