अमृत वेले का हुक्मनामा – 15 अगस्त 2026
अंग : 716
टोडी मः ५ ॥ माई मेरे मन की पिआस ॥ इकु खिनु रहि न सकउ बिनु प्रीतम दरसन देखन कउ धारी मनि आस ॥ रहाउ॥ सिमरउ नामु निरंजन करते मन तन ते सभि किलविख नास ॥ पूरन पारब्रहम सुखदाते अबिनासी बिमल जा को जास ॥१॥ संत प्रसादि मेरे पूर मनोरथ करि किरपा भेटे गुणतास ॥ सांति सहज सूख मनि उपजिओ कोटि सूर नानक परगास ॥२॥५॥२४॥
अर्थ: हे माँ! प्रीतम प्रभु (का दर्शन करने) के बिना मैं एक छिन भर भी रह नहीं सकता। मैंने अपने मन में उसके दर्शन करने के लिए आस बनाई हुई है। मेरे मन में ये प्यास (सदा टिकी रहती है)। रहाउ। हे माँ! जिस अविनाशी प्रभु की महिमा (जीवों को) पवित्र (कर देती) है, उस निरंजन कर्तार का, उस पूर्ण पारब्रहम का, उस सुखदाते का नाम मैं (सदा) स्मरण करता रहता हूँ। (नाम-जपने की इनायत से, हे माँ) मन से, तन से, सारे पाप दूर हो जाते हैं।1। हे नानक! (कह: हे माँ!) गुरु की कृपा से मेरी मुरादें पूरी हो गई हैं, गुणों के खजाने प्रभु जी मेहर करके (मुझे) मिल गए हैं। (मेरे) मन में शांति पैदा हो गई है, आत्मिक अडोलता के सुख पैदा हो गए हैं, (मानो) करोड़ों सूरजों का (मेरे अंदर) उजाला पैदा हो गया है।2।5।24।

