अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 22 जून 2026

अंग : 592
सलोकु मः ३ ॥
गुरमुखि सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥ सबदै सादु न आइओ मरि जनमै वारो वार ॥ मनमुखि अंधु न चेतई कितु आइआ सैसारि ॥ नानक जिन कउ नदरि करे से गुरमुखि लंघे पारि ॥१॥ मः ३ ॥ इको सतिगुरु जागता होरु जगु सूता मोहि पिआसि ॥ सतिगुरु सेवनि जागंनि से जो रते सचि नामि गुणतासि ॥ मनमुखि अंध न चेतनी जनमि मरि होहि बिनासि ॥ नानक गुरमुखि तिनी नामु धिआइआ जिन कंउ धुरि पूरबि लिखिआसि ॥२॥ पउड़ी॥ हरि नामु हमारा भोजनु छतीह परकार जितु खाइऐ हम कउ त्रिपति भई ॥ हरि नामु हमारा पैनणु जितु फिरि नंगे न होवह होर पैनण की हमारी सरध गई ॥ हरि नामु हमारा वणजु हरि नामु वापारु हरि नामै की हम कंउ सतिगुरि कारकुनी दीई ॥ हरि नामै का हम लेखा लिखिआ सभ जम की अगली काणि गई ॥ हरि का नामु गुरमुखि किनै विरलै धिआइआ जिन कंउ धुरि करमि परापति लिखतु पई ॥१७॥

अर्थ: अंधे मनमुख ने सतिगुरु के सन्मुख होकर न सेवा की, न ही परमात्मा के नाम में उसका प्रेम लगा। उसे शब्द में भी रस नहीं आया, इसलिए वह बार-बार जन्म लेता और मरता रहता है। यदि अंधा मनमुख हरि को याद नहीं करता, तो संसार में आने का उसने क्या लाभ पाया? हे नानक! जिन मनुष्यों पर प्रभु अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वे सतिगुरु के सन्मुख होकर संसार-सागर से पार उतर जाते हैं। ॥१॥

एक सतिगुरु ही जागृत है; बाकी सारा संसार माया के मोह और तृष्णा में सोया हुआ है। जो मनुष्य सतिगुरु की सेवा करते हैं और गुणों के खजाने सच्चे नाम में रंगे हुए हैं, वही जागते हैं। अंधे मनमुख हरि का सिमरन नहीं करते और जन्म-मरण के चक्कर में पड़कर नष्ट हो रहे हैं। हे नानक! गुरु के सन्मुख होकर उन्हीं ने नाम सिमरा है, जिनके हृदय में आदि से ही पूर्व शुभ कर्मों के संस्कारों के अनुसार लेख लिखा हुआ है। ॥२॥

हरि का नाम हमारा छत्तीस प्रकार का, अर्थात अनेक स्वादों वाला भोजन है, जिसे खाकर हम तृप्त हो गए हैं, अर्थात सांसारिक पदार्थों की ओर से संतुष्ट हो गए हैं। हरि का नाम ही हमारी पोशाक है, जिसे पहनकर हम कभी बे-पर्दा नहीं होंगे, और दूसरी सुंदर पोशाकें पहनने की हमारी इच्छा दूर हो गई है।

हरि का नाम हमारा व्यापार है, हरि का नाम ही हमारा सौदा है, और सतिगुरु ने हमें नाम की ही जिम्मेदारी सौंपी है। हमने हरि के नाम का ही लेखा लिखा है, जिसके कारण यम की पहली खुशामद और चिंता दूर हो गई है। पर किसी विरले गुरमुख ने ही हरि का नाम सिमरा है; वही सिमरते हैं जिन्हें आदि से ही प्रभु की बख्शिश द्वारा लिखे हुए लेख की प्राप्ति हुई है। ॥१७॥


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