संधिआ ​​वेले का हुक्मनामा – 21 जून 2026

अंग : 685
धनासरी महला ९ ॥
अब मै कउनु उपाउ करउ ॥ जिह बिधि मन को संसा चूकै भउ निधि पारि परउ ॥१॥ रहाउ ॥ जनमु पाइ कछु भलो न कीनो ता ते अधिक डरउ ॥ मन बच क्रम हरि गुन नही गाए यह जीअ सोच धरउ ॥१॥ गुरमति सुनि कछु गिआनु न उपजिओ पसु जिउ उदरु भरउ ॥ कहु नानक प्रभ बिरदु पछानउ तब हउ पतित तरउ ॥२॥४॥९॥९॥१३॥५८॥४॥९३॥

अर्थ: हे भाई! अब मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मेरे मन का भय समाप्त हो जाए और मैं संसार-सागर से पार हो जाऊँ। ॥१॥ रहाउ।

हे भाई! मनुष्य जन्म प्राप्त करके मैंने कोई भलाई नहीं की, इसलिए मैं बहुत डरता रहता हूँ। मैं अपनी आत्मा में हर समय यही चिंता करता रहता हूँ कि मैंने अपने मन से, वचन से और कर्म से कभी भी परमात्मा के गुण नहीं गाए। ॥१॥

हे भाई! गुरु की मति सुनकर भी मेरे भीतर आध्यात्मिक जीवन की कोई समझ पैदा नहीं हुई। मैं पशु की तरह प्रतिदिन केवल अपना पेट भरता रहता हूँ। हे नानक! कहो—हे प्रभु! मैं पापी तभी संसार-सागर से पार हो सकता हूँ, यदि तू अपना आदि-काल से चला आ रहा प्रेम-भरा स्वभाव याद रखे। ॥२॥४॥९॥९॥१३॥५८॥४॥९३॥


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