अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 02 जून 2026

अंग : 479
आसा ॥ बारह बरस बालपन बीते बीस बरस कछु तपु न कीओ ॥ तीस बरस कछु देव न पूजा फिरि पछुताना बिरधि भइओ ॥१॥ मेरी मेरी करते जनमु गइओ ॥ साइरु सोखि भुजं बलइओ ॥१॥ रहाउ ॥ सूके सरवरि पालि बंधावै लूणै खेति हथ वारि करै ॥ आइओ चोरु तुरंतह ले गइओ मेरी राखत मुगधु फिरै ॥२॥ चरन सीसु कर क्मपन लागे नैनी नीरु असार बहै ॥ जिहवा बचनु सुधु नही निकसै तब रे धरम की आस करै ॥३॥ हरि जीउ क्रिपा करै लिव लावै लाहा हरि हरि नामु लीओ ॥ गुर परसादी हरि धनु पाइओ अंते चलदिआ नालि चलिओ ॥४॥ कहत कबीर सुनहु रे संतहु अनु धनु कछूऐ लै न गइओ ॥ आई तलब गोपाल राइ की माइआ मंदर छोडि चलिओ ॥५॥२॥१५॥
अर्थ: (उम्र के पहले) बारह साल अंजानपुणे में निकल गए,उस के बाद बीस बरस और (निकल गए, भावार्थ, तीस साल उम्र निकल गई तब तक भी) कोई तप ना किया; तीस साल (ओर बीत गए, उम्र साठ बरस हो गई, तो भी) कोई भजन-बंदगी ना की, अब हाथ मलने लगा (क्योंकि) बुढा हो गया।1। ‘ममता’ में ही (जवानी की) उम्र बीत गई, शरीर-रूप समुंद्र सुख गया, और बाहों की ताकत (भी ख़त्म गई)।1।रहाउ। (अब बुढेपा आने पर भी मौत से बचने के लिए आहर करता है, पर इस के उधम इस प्रकार हैं जैसे) सुके हुए तलाब में बाड़ बाँध रहा है (ताकि पानी तलाब में से बाहर ना निकल जाए),और काटे हुए खेत के चारो और बाड़ दे रहा है। मूर्ख मनुख जिस शरीर को अपना बनाए रखने के यतन करता घूमता है,पर (जब यम रूप) चोर (भावार्थ, चुपचाप ही यम) आता है और (जीवन को) ले चलता है।2। पैर, सिर, हाथ कांपने लग जाते हैं, आँखें में से आप-मुहारे पानी बहता जाता है, जिव्हा में से कोई साफ लफ्ज नहीं निकलता। हे मूर्ख ! (क्या) उस समय तूँ धर्म कमाने की आशा करता हैं ?।3। जिस मनुख के ऊपर परमात्मा कृपा करता है, उस की सुरति (अपने चरणों में) जोड़ता है, वह मनुख परमात्मा का नाम-रूप लाभ खट्ता है। जगत से चलते समय भी यही नाम-धन (मनुख के) के साथ जाता है (पर) यह धन मिलता है सतिगुरु की कृपा के साथ।4। कबीर कहता है-हे संत जनो ! सुनो, (कोई जीव भी मरन समय) कोई ओर धन-पदार्थ अपने साथ नहीं ले जाता,क्योंकि जब परमात्मा की तरफ से सन्देश आता है तो मनुख दौलत और घर (सब कुछ यहाँ ही) छोड़ के चल पड़ता है।5।2।15।


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