अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 01 जून 2026

अंग : 489
गूजरी महला १ ॥ नाभि कमल ते ब्रहमा उपजे बेद पड़हि मुखि कंठि सवारि ॥ ता को अंतु न जाई लखणा आवत जात रहै गुबारि ॥१॥ प्रीतम किउ बिसरहि मेरे प्राण अधार ॥ जा की भगति करहि जन पूरे मुनि जन सेवहि गुर वीचारि ॥१॥ रहाउ ॥ रवि ससि दीपक जा के त्रिभवणि एका जोति मुरारि ॥ गुरमुखि होइ सु अहिनिसि निरमलु मनमुखि रैणि अंधारि ॥२॥ सिध समाधि करहि नित झगरा दुहु लोचन किआ हेरै ॥ अंतरि जोति सबदु धुनि जागै सतिगुरु झगरु निबेरै ॥३॥ सुरि नर नाथ बेअंत अजोनी साचै महलि अपारा ॥ नानक सहजि मिले जगजीवन नदरि करहु निसतारा ॥४॥२॥
अर्थ: (पुरान ग्रंथों में कथा आती है की जिस ब्रह्मा के रचे हुए) वेद (पंडित लोग) मुख से गले से मीठे स्वर में प्रतिदिन पड़ते हैं, वह ब्रह्मा विष्णु की धुन्नी में से उगे हुए कमल की नाल से पैदा हुआ, (और अपने जन्म-दाते की कुदरत का अंत पाने के लिए उसी में चल पड़ा, कई युग उस नाल के) अँधेरे में आता जाता रहा, परन्तु उस का अंत न पा सका॥१॥ हे मेरी जिन्दगी के सहारे प्रीतम! मुझे न भूल। तूं वो है जिस की भक्ति पूरण पुरख सदा करते रहते हैं, जिस को ऋषि मुनि गुरु की बताई सूझ के सहारे सदा सिमरते है॥१॥रहाउ॥ वह प्रभु इतना बड़ा है की सूरज और चंद्रमा उस के त्रिभ्वनी जगत में (मानो नन्हे से) दीपक (ही) हैं, सारे जगत में उस की जोत व्यपाक है। जो मनुख गुरु के बताये हुए राह पर चल के उस को दिन रात मिलता है वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। जो मनुख अपने मन के पीछे चलता है उस की जिन्दगी की रात (अज्ञानता के) अन्धकार में बीतती है॥२॥ बड़े-बड़े जोगी (अपने ही उद्यम की टेक रख के) समाधियां लगाते हैं और मन को जीतने के प्रयत्न करते हैं (पर जो मनुष्य अपने उद्यम की ही टेक रखे, उसे) वह अंदर बसती ज्योति इन आँखों से नहीं दिखती। (जो मनुष्य गुरु के सन्मुख होता है) उसका मन वाला झगड़ा गुरु समाप्त कर देता है, उसके अंदर गुरु का शब्द-रूप मीठी लगन लग पड़ती है, उसके अंदर परमात्मा की ज्योति जग पड़ती है।੩। हे नानक! (अरदास कर-) हे देवताओं और मनुष्यों के पति! हे बेअंत! हे योनि-रहित! और अटल महल में टिके रहने वाले अपार प्रभु! हे जगत के जीवन! (मेहर कर मुझे) अडोलता में निवास मिले। मेहर की निगाह करके मेरा बेड़ा पार कर।੪।੨।


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