अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 19 मई 2026

अंग : 711
टोडी महला ५ घरु १ दुपदे ॥ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ संतन अवर न काहू जानी ॥ बेपरवाह सदा रंगि हरि कै जा को पाखु सुआमी ॥ रहाउ ॥ ऊच समाना ठाकुर तेरो अवर न काहू तानी ॥ ऐसो अमरु मिलिओ भगतन कउ राचि रहे रंगि गिआनी ॥१॥ रोग सोग दुख जरा मरा हरि जनहि नही निकटानी ॥ निरभउ होइ रहे लिव एकै नानक हरि मनु मानी ॥२॥१॥
अर्थ: हे भाई! जिनकी मदद परमात्मा करता है वे संत जन किसी और की (मुथाजी करनी) नहीं जानते। वे परमात्मा के प्यार में (टिक के) सदा बेपरवाह रहते हैं ॥ रहाउ ॥ (हे भाई! वे संत जन यूँ कहते रहते हैं -) हे मालिक प्रभू! तेरा शामयाना (सब शाहों-बादशाहों के शामयानों से) ऊँचा है, किसी और ने (इतना ऊँचा शामयाना कभी) नहीं ताना। हे भाई! संत जनों को ऐसा सदा कायम रहने वाला हरी मिला रहता है, आत्मिक जीवन की सूझ वाले वे संत जन (सदा) परमात्मा के प्रेम में ही मस्त रहते हैं ॥१॥ हे नानक! रोग, चिंता-फिक्र, बुढ़ापा, मौत (इनके सहम) परमात्मा के सेवकों कें नजदीक भी नहीं फटकते। वह एक परमात्मा में ही सुरति जोड़ के (दुनिया के डरों की ओर से) निडर रहते हैं उनका मन प्रभू की याद में पतीजा रहता है ॥२॥१॥


Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Begin typing your search term above and press enter to search. Press ESC to cancel.

Back To Top