अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 29 मार्च 2026

अंग : 768
ੴ सतिगुर प्रसादि रागु सूही महला ३ घरु ३ भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥ सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥ हउमै सबदि जलाइआ मेरे हरि भाइआ जिस दी साची बाणी ॥ सची भगति करहि दिनु राती गुरमुखि आखि वखाणी ॥ भगता की चाल सची अति निरमल नामु सचा मनि भाइआ ॥ नानक भगत सोहहि दरि साचै जिनी सचो सचु कमाइआ ॥१॥ हरि भगता की जाति पति है भगत हरि कै नामि समाणे राम ॥ हरि भगति करहि विचहु आपु गवावहि जिन गुण अवगण पछाणे राम ॥ गुण अउगण पछाणै हरि नामु वखाणै भै भगति मीठी लागी ॥ अनदिनु भगति करहि दिनु राती घर ही महि बैरागी ॥ भगती राते सदा मनु निरमलु हरि जीउ वेखहि सदा नाले ॥ नानक से भगत हरि कै दरि साचे अनदिनु नामु सम्ह्हाले ॥२॥
अर्थ: हे भाई ! परमात्मा अपने भक्तों की इज्ज़त रखता है, हरेक जुग में (भक्तों की) इज्ज़त रखता आया है। जो मनुख गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलता है, वह भगवान का भक्त बन जाता है, वह मनुख गुरु के शब्द में जुड़ के अपनी हऊमै दूर करता है। हे भाई ! जो मनुख गुरु के शब्द के द्वारा अपने अंदर से हऊमै जलाता है, वह उस परमात्मा को प्यारा लगता है जिस की सिफ़त-सालाह सदा अटल रहने वाली है। गुरु के सनमुख रहने वाले मनुख दिन रात परमात्मा की सदा-थिर रहने वाले भक्ति करते रहते हैं, वह आप सिफ़त-सालाह वाली बाणी उच्चारते रहते हैं, और ओरों को भी उस की सूझ देते हैं। हे भाई ! भक्तों की जीवन-जुगती सदा एक-रस रहने वाली और बड़ी पवित्र होती है, उन के मन में परमात्मा का सदा-थिर नाम प्यारा लगता रहता है। हे नानक ! परमात्मा के भक्त सदा-थिर परमात्मा के दर पर सुशोभित हैं, वह परमात्मा का सदा-थिर रहने वाला नाम ही सदा जपते रहते हैं।1।


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